नई दिल्ली: Supreme Court of India ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करने वाले अपने ही पुराने फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA जैसे सख्त कानूनों के मामलों में भी “बेल नियम है और जेल अपवाद।”
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने एक अलग UAPA मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत जम्मू-कश्मीर के एक आरोपी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसे कथित नार्को-टेररिज्म मामले में पांच साल से अधिक समय से हिरासत में रखा गया था। सुनवाई के दौरान अदालत ने जनवरी 2026 में दिए गए उस फैसले पर “गंभीर आपत्ति” जताई, जिसमें उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं।
जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ ने दिल्ली दंगों की “बड़ी साजिश” मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था। अदालत ने उस समय कहा था कि दोनों अन्य आरोपियों की तुलना में “अलग और उच्च स्तर की भूमिका” में दिखाई देते हैं। उसी फैसले में गल्फिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, शादाब अहमद और मोहम्मद सलीम खान को सशर्त जमानत दी गई थी।
अब नई पीठ ने कहा है कि पहले के फैसले में 2021 के “Union of India vs KA Najeeb” मामले के सिद्धांतों को ठीक तरीके से लागू नहीं किया गया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि यदि किसी आरोपी का ट्रायल लंबे समय तक पूरा नहीं हो पाता और वह लंबे समय से जेल में है, तो संवैधानिक अदालतें उसे जमानत दे सकती हैं, भले ही मामला UAPA जैसे विशेष कानून के तहत क्यों न हो।
न्यायालय ने कहा कि KA Najeeb फैसला “बाध्यकारी कानून” है और निचली अदालतें, हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की छोटी पीठें भी इसे नजरअंदाज नहीं कर सकतीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि बड़ी पीठ के फैसले को कमजोर या दरकिनार करना न्यायिक अनुशासन के खिलाफ है।
पीठ ने UAPA की धारा 43D(5) की भी चर्चा की, जिसके तहत अदालतों को जमानत देने से पहले यह देखना होता है कि अभियोजन के पास आरोपी के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं। अदालत ने कहा कि इस प्रावधान का इस्तेमाल अनिश्चितकाल तक हिरासत को उचित ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान अदालत ने 2019 के “NIA बनाम ज़हूर अहमद शाह वटाली” फैसले का भी उल्लेख किया। इस फैसले को अक्सर UAPA मामलों में जमानत खारिज करने के लिए आधार के रूप में उद्धृत किया जाता है। हालांकि नई पीठ ने कहा कि वटाली फैसले को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि लंबे समय तक बिना ट्रायल के हिरासत को सामान्य बना दिया जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। यदि ट्रायल में अत्यधिक देरी होती है और आरोपी लंबे समय तक जेल में रहता है, तो अदालतों को इस पहलू पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
उमर खालिद और शरजील इमाम दोनों को फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े “बड़ी साजिश” मामले में गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली पुलिस का आरोप है कि दंगों के पीछे योजनाबद्ध साजिश थी और दोनों आरोपियों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका थी। दोनों पर UAPA सहित कई गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
जनवरी 2026 में जमानत खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश सामग्री प्रथमदृष्टया आरोपों को समर्थन देती है। अदालत ने यह भी कहा था कि ट्रायल में देरी अपने आप जमानत का आधार नहीं बनती।
हालिया टिप्पणियों के बाद इस मामले पर कानूनी और राजनीतिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की नई टिप्पणी भविष्य में UAPA मामलों में जमानत से जुड़ी सुनवाई पर असर डाल सकती है। वहीं अदालत ने अभी तक उमर खालिद या शरजील इमाम की जमानत पर कोई नया आदेश जारी नहीं किया है।
यह मामला लंबे समय से भारतीय न्याय व्यवस्था, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, राष्ट्रीय सुरक्षा और UAPA जैसे कठोर कानूनों के इस्तेमाल को लेकर बहस का केंद्र बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की नई टिप्पणियों के बाद अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले समय में अदालतें ऐसे मामलों में जमानत से जुड़े सिद्धांतों की व्याख्या किस तरह करती हैं।

