वैश्विक राजनीति, कारोबारी विस्तार और सत्ता-पूंजी गठजोड़ पर बड़ा सवाल
नई दिल्ली: भारत के सबसे चर्चित उद्योगपतियों में शामिल गौतम अडानी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबंध एक बार फिर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बहस के केंद्र में हैं। The Wire में प्रकाशित एक विस्तृत विश्लेषण में सवाल उठाया गया है कि क्या गौतम अडानी भारत के “आर्थिक राजदूत” बन चुके हैं या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैश्विक स्तर पर अडानी समूह के कारोबारी हितों को आगे बढ़ाने में “मध्यस्थ” की भूमिका निभा रहे हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अडानी समूह का अंतरराष्ट्रीय विस्तार तेज़ी से बढ़ा। इसी दौरान कई विदेशी दौरों में गौतम अडानी प्रधानमंत्री मोदी के साथ दिखाई दिए। आलोचकों का आरोप है कि कई देशों में मोदी सरकार की कूटनीतिक सक्रियता के बाद वहां अडानी समूह को बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, बंदरगाह और एयरपोर्ट प्रोजेक्ट मिले।
बांग्लादेश से श्रीलंका तक बढ़ता अडानी नेटवर्क
विश्लेषण के अनुसार, 2015 में प्रधानमंत्री मोदी की बांग्लादेश यात्रा के बाद अडानी समूह और Bangladesh Power Development Board के बीच बिजली आपूर्ति समझौता हुआ। बाद में इस प्रोजेक्ट को लेकर बांग्लादेश में विवाद भी खड़ा हुआ। आलोचकों का आरोप था कि बिजली की कीमतें अत्यधिक थीं और समझौता पारदर्शी नहीं था।
श्रीलंका में भी अडानी समूह को कोलंबो पोर्ट टर्मिनल और ऊर्जा परियोजनाओं से जुड़े बड़े कॉन्ट्रैक्ट मिले। रिपोर्ट में दावा किया गया कि श्रीलंका के कुछ अधिकारियों ने आरोप लगाया था कि भारत सरकार की ओर से इन प्रोजेक्ट्स के लिए दबाव बनाया गया। हालांकि भारत सरकार और अडानी समूह ने ऐसे आरोपों को खारिज किया। बाद में श्रीलंका की नई सरकार ने कुछ परियोजनाएं रद्द भी कर दीं।
नेपाल, केन्या और अफ्रीका में भी बढ़ा प्रभाव
The Wire के विश्लेषण में कहा गया है कि नेपाल के एयरपोर्ट प्रबंधन से लेकर अफ्रीकी देशों में बंदरगाह और ऊर्जा परियोजनाओं तक अडानी समूह की मौजूदगी लगातार बढ़ी। केन्या में एयरपोर्ट आधुनिकीकरण और बिजली परियोजनाओं के लिए हुए समझौते बाद में विवादों में आ गए और अंततः कुछ कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिए गए।
तंजानिया में भी अडानी समूह को बंदरगाह संचालन का लंबी अवधि का अनुबंध मिला। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत ने कई देशों में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी का रास्ता चुना, जिसमें अडानी समूह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता दिखाई दिया।
इजराइल और भारत की रणनीतिक साझेदारी
अडानी समूह ने इजराइल के साथ भी कई बड़े समझौते किए। 2022 में Haifa Port के निजीकरण में अडानी समूह की अगुवाई वाले कंसोर्टियम ने बड़ी हिस्सेदारी हासिल की। इसके अलावा रक्षा तकनीक और ड्रोन निर्माण में भी इजराइली कंपनियों के साथ साझेदारी की गई। रिपोर्ट के अनुसार, यह भारत की पश्चिम एशिया रणनीति और India-Middle East-Europe Corridor जैसी योजनाओं से भी जुड़ा हुआ माना गया।
ऑस्ट्रेलिया में विरोध और पर्यावरण विवाद
ऑस्ट्रेलिया में अडानी समूह की कोयला परियोजना को लेकर बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि इस परियोजना से पर्यावरण और आदिवासी समुदायों को नुकसान होगा। “Adani Watch” जैसे अभियान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए।
Hindenburg रिपोर्ट और अमेरिकी आरोप
2023 में अमेरिकी रिसर्च फर्म Hindenburg Research ने अडानी समूह पर शेयर हेरफेर, अकाउंटिंग फ्रॉड और टैक्स हेवन नेटवर्क के इस्तेमाल जैसे गंभीर आरोप लगाए। इस रिपोर्ट के बाद अडानी समूह की कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई और बाजार मूल्य में अरबों डॉलर का नुकसान हुआ।
इसके बाद 2024 में अमेरिकी न्याय विभाग ने गौतम अडानी और अन्य अधिकारियों पर रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी से जुड़े आरोप लगाए। अमेरिकी अभियोजकों का दावा था कि 2020 से 2024 के बीच भारतीय अधिकारियों को करोड़ों डॉलर की रिश्वत देकर सौर ऊर्जा कॉन्ट्रैक्ट हासिल किए गए। अडानी समूह ने सभी आरोपों को “बेबुनियाद” बताया।
विपक्ष के आरोप और राहुल गांधी का हमला
कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार अडानी-मोदी संबंधों को लेकर सरकार पर हमला करते रहे हैं। संसद में राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी और गौतम अडानी की तस्वीर दिखाते हुए कहा था कि “यह भारत की विदेश नीति नहीं, अडानी की विदेश नीति है।”
विपक्ष का आरोप है कि सरकार की नीतियों का लाभ चुनिंदा कॉरपोरेट समूहों को मिला। वहीं भाजपा और अडानी समूह इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते रहे हैं। सरकार का कहना है कि भारत के बड़े उद्योगपति वैश्विक स्तर पर देश की आर्थिक शक्ति को बढ़ा रहे हैं।
क्या भारत में बढ़ रहा है ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’?
विशेषज्ञों का मानना है कि अडानी समूह का तेज़ विस्तार भारत में “क्रोनी कैपिटलिज्म” यानी सत्ता और पूंजी के करीबी संबंधों की बहस को और मजबूत करता है। आलोचकों का कहना है कि जब सरकार और बड़े कॉरपोरेट समूहों के हित एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं तो पारदर्शिता और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा पर सवाल उठते हैं।
हालांकि समर्थकों का तर्क है कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट और वैश्विक निवेश भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए जरूरी हैं और अडानी जैसे उद्योगपति देश की आर्थिक पहुंच को बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं।
निष्कर्ष
गौतम अडानी और नरेंद्र मोदी के रिश्तों को लेकर चल रही बहस केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं है। यह सवाल भारत की आर्थिक नीति, विदेश नीति, कॉरपोरेट प्रभाव और लोकतांत्रिक पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है।
एक पक्ष इसे भारत के उभरते आर्थिक प्रभाव का प्रतीक मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे सत्ता और बड़े उद्योगपतियों के बीच खतरनाक नजदीकी के रूप में देखता है। आने वाले वर्षों में अदालतों, जांच एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की प्रतिक्रिया तय करेगी कि यह मॉडल भारत के लिए अवसर साबित होगा या विवाद का स्थायी कारण बनेगा।

