भारत ने क्यों ठुकराया ‘कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ का फैसला? इंडस वॉटर ट्रीटी पर नया विवाद गहराया

Praveen Yadav
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भारत ने क्यों ठुकराया ‘कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ का फैसला? इंडस वॉटर ट्रीटी पर नया विवाद गहराया  भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुरानी इंडस वॉटर ट्रीटी एक बार फिर बड़े विवाद के केंद्र में आ गई है। भारत सरकार ने हेग स्थित तथाकथित “कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन” (CoA) द्वारा दिए गए हालिया “पोंडेज अवॉर्ड” को पूरी तरह खारिज कर दिया है और साफ कहा है कि यह अदालत “अवैध रूप से गठित” है। भारत का कहना है कि उसने इस अदालत को कभी मान्यता नहीं दी, इसलिए इसके किसी भी फैसले का भारत पर कोई कानूनी प्रभाव नहीं पड़ता।  विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत का पहले लिया गया फैसला, जिसमें इंडस वॉटर ट्रीटी को “abeyance” यानी अस्थायी रूप से निलंबित रखने की बात कही गई थी, अब भी प्रभावी है। भारत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि राष्ट्रीय हित और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अब उसका रुख पहले की तुलना में कहीं अधिक सख्त रहेगा।  पूरा विवाद उस समय फिर से सुर्खियों में आया जब 15 मई 2026 को कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने “maximum pondage” से जुड़ा एक सप्लीमेंट्री अवॉर्ड जारी किया। “पोंडेज” का मतलब किसी जलविद्युत परियोजना में सीमित मात्रा में पानी जमा करने की अनुमति से है। पाकिस्तान लंबे समय से भारत की कुछ हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजनाओं, विशेष रूप से Kishanganga Hydroelectric Project और Ratle Hydroelectric Plant के डिजाइन और संचालन पर आपत्ति जताता रहा है।  पाकिस्तान का आरोप है कि इन परियोजनाओं के जरिए भारत पश्चिमी नदियों के जल प्रवाह को प्रभावित करने की क्षमता हासिल कर सकता है। पाकिस्तान को आशंका है कि भविष्य में भारत इन नदियों के पानी पर अधिक नियंत्रण स्थापित कर सकता है, जिससे उसके कृषि और पेयजल संसाधनों पर असर पड़ेगा। दूसरी ओर भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसकी सभी परियोजनाएं इंडस वॉटर ट्रीटी के नियमों के अनुरूप हैं और उनका उद्देश्य केवल जलविद्युत उत्पादन है, न कि पानी रोकना।  भारत की सबसे बड़ी आपत्ति कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की वैधता को लेकर है। भारत का तर्क है कि इंडस वॉटर ट्रीटी में विवाद समाधान की एक तय प्रक्रिया है, जिसमें तकनीकी मामलों को पहले “Neutral Expert” के पास भेजा जाना चाहिए। भारत का कहना है कि पाकिस्तान ने इस प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए सीधे अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का रास्ता अपनाया, जो संधि की मूल भावना के खिलाफ है।  नई दिल्ली का मानना है कि एक ही समय पर “Neutral Expert” और “Court of Arbitration” दोनों प्रक्रियाओं का चलना अंतरराष्ट्रीय कानून और संधि व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। यही कारण है कि भारत ने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की कार्यवाही में भाग लेने से इनकार कर दिया था। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने हाल ही में कहा कि भारत इस तथाकथित अदालत को “illegal and improperly constituted” मानता है और इसके सभी फैसले भारत के लिए “null and void” यानी शून्य और अमान्य हैं।  इंडस वॉटर ट्रीटी दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जल-साझेदारी संधियों में गिनी जाती है। यह संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इस समझौते के तहत भारत को पूर्वी नदियों Ravi, Beas और Sutlej का अधिकार मिला, जबकि पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों Indus, Jhelum और Chenab के अधिकांश जल उपयोग का अधिकार दिया गया। हालांकि भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित सिंचाई और रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाएं बनाने की अनुमति दी गई थी।  संधि पर उस समय भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। पिछले छह दशकों में भारत और पाकिस्तान के बीच कई युद्ध और गंभीर तनाव की स्थितियां पैदा हुईं, लेकिन इसके बावजूद यह संधि लंबे समय तक कायम रही। यही वजह है कि इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सफल जल समझौते के रूप में देखा जाता रहा है।  हालांकि पिछले कुछ वर्षों में भारत का रुख बदलता दिखाई दिया है। विशेष रूप से अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पहली बार इंडस वॉटर ट्रीटी को “abeyance” में रखने का फैसला किया। भारत ने पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देने का आरोप लगाया और स्पष्ट संदेश दिया कि “आतंक और पानी साथ नहीं चल सकते।”  इसके बाद भारत ने पश्चिमी नदियों के अपने अधिकारों का अधिकतम उपयोग करने की रणनीति पर तेजी से काम शुरू किया। कई जलविद्युत और जल प्रबंधन परियोजनाओं की समीक्षा की गई और यह संकेत दिए गए कि भारत अब अपने हिस्से के पानी का पूरा उपयोग सुनिश्चित करेगा।  विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान विवाद केवल कानूनी या तकनीकी नहीं बल्कि रणनीतिक और राजनीतिक भी है। पाकिस्तान के लिए इंडस नदी प्रणाली उसकी अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा मानी जाती है। वहां की खेती, सिंचाई और बड़ी आबादी की पेयजल जरूरतें इन्हीं नदियों पर निर्भर करती हैं। ऐसे में किसी भी संभावित जल नियंत्रण को लेकर पाकिस्तान बेहद संवेदनशील रहता है।  दूसरी ओर भारत अब यह तर्क दे रहा है कि दशकों पुरानी संधि को वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार पुनर्विचार की आवश्यकता है। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता, तब तक सामान्य संबंधों की उम्मीद नहीं की जा सकती।  विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के हालिया फैसले का व्यावहारिक असर सीमित रह सकता है, क्योंकि भारत पहले ही इस अदालत को मान्यता देने से इनकार कर चुका है। लेकिन यह विवाद आने वाले समय में भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव को और बढ़ा सकता है।  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस पूरे मामले पर नजर बनी हुई है, क्योंकि इंडस वॉटर ट्रीटी को लंबे समय तक भारत और पाकिस्तान के बीच सहयोग के एक दुर्लभ उदाहरण के रूप में देखा जाता रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले महीनों में दोनों देश बातचीत का रास्ता अपनाते हैं या यह विवाद और गहराता है।  फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि भारत अब इंडस वॉटर ट्रीटी को लेकर पहले जैसी नरम नीति अपनाने के मूड में नहीं है। नई दिल्ली का फोकस अब राष्ट्रीय सुरक्षा, जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग और रणनीतिक हितों की रक्षा पर केंद्रित दिखाई दे रहा है।

भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुरानी इंडस वॉटर ट्रीटी एक बार फिर बड़े विवाद के केंद्र में आ गई है। भारत सरकार ने हेग स्थित तथाकथित “कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन” (CoA) द्वारा दिए गए हालिया “पोंडेज अवॉर्ड” को पूरी तरह खारिज कर दिया है और साफ कहा है कि यह अदालत “अवैध रूप से गठित” है। भारत का कहना है कि उसने इस अदालत को कभी मान्यता नहीं दी, इसलिए इसके किसी भी फैसले का भारत पर कोई कानूनी प्रभाव नहीं पड़ता।


विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत का पहले लिया गया फैसला, जिसमें इंडस वॉटर ट्रीटी को “abeyance” यानी अस्थायी रूप से निलंबित रखने की बात कही गई थी, अब भी प्रभावी है। भारत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि राष्ट्रीय हित और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अब उसका रुख पहले की तुलना में कहीं अधिक सख्त रहेगा।


पूरा विवाद उस समय फिर से सुर्खियों में आया जब 15 मई 2026 को कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने “maximum pondage” से जुड़ा एक सप्लीमेंट्री अवॉर्ड जारी किया। “पोंडेज” का मतलब किसी जलविद्युत परियोजना में सीमित मात्रा में पानी जमा करने की अनुमति से है। पाकिस्तान लंबे समय से भारत की कुछ हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजनाओं, विशेष रूप से Kishanganga Hydroelectric Project और Ratle Hydroelectric Plant के डिजाइन और संचालन पर आपत्ति जताता रहा है।


पाकिस्तान का आरोप है कि इन परियोजनाओं के जरिए भारत पश्चिमी नदियों के जल प्रवाह को प्रभावित करने की क्षमता हासिल कर सकता है। पाकिस्तान को आशंका है कि भविष्य में भारत इन नदियों के पानी पर अधिक नियंत्रण स्थापित कर सकता है, जिससे उसके कृषि और पेयजल संसाधनों पर असर पड़ेगा। दूसरी ओर भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसकी सभी परियोजनाएं इंडस वॉटर ट्रीटी के नियमों के अनुरूप हैं और उनका उद्देश्य केवल जलविद्युत उत्पादन है, न कि पानी रोकना।


भारत की सबसे बड़ी आपत्ति कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की वैधता को लेकर है। भारत का तर्क है कि इंडस वॉटर ट्रीटी में विवाद समाधान की एक तय प्रक्रिया है, जिसमें तकनीकी मामलों को पहले “Neutral Expert” के पास भेजा जाना चाहिए। भारत का कहना है कि पाकिस्तान ने इस प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए सीधे अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का रास्ता अपनाया, जो संधि की मूल भावना के खिलाफ है।


नई दिल्ली का मानना है कि एक ही समय पर “Neutral Expert” और “Court of Arbitration” दोनों प्रक्रियाओं का चलना अंतरराष्ट्रीय कानून और संधि व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। यही कारण है कि भारत ने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की कार्यवाही में भाग लेने से इनकार कर दिया था। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने हाल ही में कहा कि भारत इस तथाकथित अदालत को “illegal and improperly constituted” मानता है और इसके सभी फैसले भारत के लिए “null and void” यानी शून्य और अमान्य हैं।


इंडस वॉटर ट्रीटी दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जल-साझेदारी संधियों में गिनी जाती है। यह संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इस समझौते के तहत भारत को पूर्वी नदियों Ravi, Beas और Sutlej का अधिकार मिला, जबकि पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों Indus, Jhelum और Chenab के अधिकांश जल उपयोग का अधिकार दिया गया। हालांकि भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित सिंचाई और रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाएं बनाने की अनुमति दी गई थी।


संधि पर उस समय भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। पिछले छह दशकों में भारत और पाकिस्तान के बीच कई युद्ध और गंभीर तनाव की स्थितियां पैदा हुईं, लेकिन इसके बावजूद यह संधि लंबे समय तक कायम रही। यही वजह है कि इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सफल जल समझौते के रूप में देखा जाता रहा है।


हालांकि पिछले कुछ वर्षों में भारत का रुख बदलता दिखाई दिया है। विशेष रूप से अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पहली बार इंडस वॉटर ट्रीटी को “abeyance” में रखने का फैसला किया। भारत ने पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देने का आरोप लगाया और स्पष्ट संदेश दिया कि “आतंक और पानी साथ नहीं चल सकते।”


इसके बाद भारत ने पश्चिमी नदियों के अपने अधिकारों का अधिकतम उपयोग करने की रणनीति पर तेजी से काम शुरू किया। कई जलविद्युत और जल प्रबंधन परियोजनाओं की समीक्षा की गई और यह संकेत दिए गए कि भारत अब अपने हिस्से के पानी का पूरा उपयोग सुनिश्चित करेगा।


विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान विवाद केवल कानूनी या तकनीकी नहीं बल्कि रणनीतिक और राजनीतिक भी है। पाकिस्तान के लिए इंडस नदी प्रणाली उसकी अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा मानी जाती है। वहां की खेती, सिंचाई और बड़ी आबादी की पेयजल जरूरतें इन्हीं नदियों पर निर्भर करती हैं। ऐसे में किसी भी संभावित जल नियंत्रण को लेकर पाकिस्तान बेहद संवेदनशील रहता है।


दूसरी ओर भारत अब यह तर्क दे रहा है कि दशकों पुरानी संधि को वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार पुनर्विचार की आवश्यकता है। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता, तब तक सामान्य संबंधों की उम्मीद नहीं की जा सकती।


विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के हालिया फैसले का व्यावहारिक असर सीमित रह सकता है, क्योंकि भारत पहले ही इस अदालत को मान्यता देने से इनकार कर चुका है। लेकिन यह विवाद आने वाले समय में भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव को और बढ़ा सकता है।


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस पूरे मामले पर नजर बनी हुई है, क्योंकि इंडस वॉटर ट्रीटी को लंबे समय तक भारत और पाकिस्तान के बीच सहयोग के एक दुर्लभ उदाहरण के रूप में देखा जाता रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले महीनों में दोनों देश बातचीत का रास्ता अपनाते हैं या यह विवाद और गहराता है।


फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि भारत अब इंडस वॉटर ट्रीटी को लेकर पहले जैसी नरम नीति अपनाने के मूड में नहीं है। नई दिल्ली का फोकस अब राष्ट्रीय सुरक्षा, जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग और रणनीतिक हितों की रक्षा पर केंद्रित दिखाई दे रहा है।

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