उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले से इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला मामला सामने आया है। सचेंडी थाना क्षेत्र में एक अनुसूचित जाति के किशोर के साथ कथित तौर पर सिर्फ इसलिए अमानवीय व्यवहार किया गया क्योंकि उसने प्यास लगने पर ऊंची जाति के युवक की पानी की बाल्टी छू ली। आरोप है कि इसके बाद आरोपी युवक ने अपने भाई और दो अन्य साथियों के साथ मिलकर किशोर को बेरहमी से प्रताड़ित किया, जूते पर थूक कर चटवाया और फिर उसी जूते में पानी भरकर जबरन पिलाया। इतना ही नहीं, किशोर को निर्वस्त्र कर बुरी तरह पीटा गया, जिससे उसके हाथ में फ्रैक्चर हो गया।
घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया। पीड़ित के परिवार ने आरोप लगाया कि यदि आसपास के लोग बीचबचाव के लिए नहीं आते तो किशोर की जान को भी खतरा हो सकता था। लोगों के हस्तक्षेप के बाद आरोपियों ने किशोर को छोड़ा। गंभीर हालत में उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने हाथ में फ्रैक्चर की पुष्टि की।
पीड़ित किशोर के पिता की शिकायत पर पुलिस ने चारों आरोपियों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट, मारपीट, धमकी और अन्य गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि आरोपियों की तलाश की जा रही है और मामले में सख्त कार्रवाई की जाएगी।
यह घटना एक बार फिर उत्तर प्रदेश समेत देशभर में दलित समुदाय के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। संविधान और कानून में बराबरी के अधिकार दिए जाने के बावजूद आज भी कई जगहों पर जातिगत भेदभाव और सामाजिक हिंसा की घटनाएं सामने आती रहती हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB के आंकड़ों के अनुसार अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराध के मामलों में पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिपोर्टों के मुताबिक हर साल हजारों मामले दर्ज होते हैं, जिनमें मारपीट, सामाजिक बहिष्कार, जमीन विवाद, सार्वजनिक अपमान, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और हत्या तक के मामले शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश उन राज्यों में शामिल रहा है जहां दलित उत्पीड़न के मामले बड़ी संख्या में सामने आते रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में सामाजिक संरचना और जातिगत वर्चस्व की मानसिकता अब भी कई जगह मजबूत बनी हुई है। छोटी-छोटी बातों को लेकर भी दलित समुदाय के लोगों को हिंसा और अपमान का सामना करना पड़ता है।
पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों से कई दर्दनाक घटनाएं सामने आई हैं। राजस्थान में दलित बच्चों को स्कूल में अलग बैठाने और पानी के बर्तन छूने पर पीटे जाने के मामले चर्चा में रहे। मध्य प्रदेश में मंदिर में प्रवेश को लेकर दलित युवकों के साथ मारपीट की घटनाएं सामने आईं। गुजरात में घोड़ी पर चढ़कर शादी निकालने पर दलित दूल्हों पर हमले हुए। बिहार और उत्तर प्रदेश में भी सार्वजनिक स्थानों पर पानी पीने, बाल कटवाने या मूंछ रखने जैसी बातों पर दलित युवकों को प्रताड़ित किए जाने की खबरें लगातार आती रही हैं।
वर्ष 2022 में राजस्थान के जालौर में एक नौ वर्षीय दलित छात्र की कथित तौर पर इसलिए पिटाई की गई थी क्योंकि उसने स्कूल में ऊंची जाति के शिक्षक के लिए रखे मटके से पानी पी लिया था। बाद में बच्चे की मौत हो गई थी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था और जातिगत भेदभाव पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी थी।
इसी तरह मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और हरियाणा से भी ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं जहां दलित समुदाय के लोगों को सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल या सामाजिक बराबरी दिखाने पर हिंसा का सामना करना पड़ा। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कानून सख्त होने के बावजूद जमीन स्तर पर मानसिकता में बदलाव की रफ्तार बेहद धीमी है।
कानून विशेषज्ञों के अनुसार एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम दलित और आदिवासी समुदायों को सुरक्षा देने के लिए बनाया गया था। इस कानून में गिरफ्तारी और सख्त सजा के प्रावधान हैं, ताकि जातिगत हिंसा पर रोक लगाई जा सके। लेकिन कई मामलों में पीड़ित परिवार न्याय मिलने में देरी, सामाजिक दबाव और डर जैसी समस्याओं का सामना करते हैं।
सामाजिक संगठनों का कहना है कि सिर्फ कानूनी कार्रवाई काफी नहीं है। समाज में जागरूकता, शिक्षा और समानता की भावना को मजबूत करना भी जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक जातिगत श्रेष्ठता की सोच खत्म नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाओं को पूरी तरह रोकना मुश्किल रहेगा।
कानपुर की यह घटना सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रही है। लोग आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। कई सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने घटना की निंदा करते हुए कहा है कि यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं बल्कि मानवता और संविधान में दिए गए समानता के अधिकार पर हमला है।
फिलहाल पुलिस मामले की जांच में जुटी हुई है और आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है। लेकिन यह घटना एक बार फिर उस कड़वी सच्चाई को सामने लाती है कि आधुनिक भारत में तकनीकी प्रगति और आर्थिक विकास के बावजूद समाज के कई हिस्सों में जातिगत भेदभाव अब भी गहरी जड़ें जमाए हुए है।

