भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाती है, लेकिन देश के करोड़ों श्रमिकों की वास्तविक कमाई को लेकर आई एक नई रिपोर्ट ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालिया आंकड़ों के अनुसार भारत के असंगठित गैर-कृषि क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों की औसत दैनिक आय न्यूनतम वेतन के तय मानकों से भी नीचे बनी हुई है। यह स्थिति खास तौर पर छोटे कारोबार, दुकानों, वर्कशॉप, घरेलू उत्पादन इकाइयों और सेवा क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों के लिए चिंताजनक मानी जा रही है। 0
रिपोर्ट के अनुसार विनिर्माण यानी manufacturing क्षेत्र में औसत दैनिक कमाई लगभग 391 रुपये रही, जबकि व्यापार क्षेत्र में यह करीब 401 रुपये और अन्य सेवा क्षेत्रों में लगभग 420 रुपये प्रतिदिन दर्ज की गई। दूसरी ओर गैर-कृषि असंगठित श्रमिकों के लिए तय न्यूनतम वेतन का मानक लगभग 477 रुपये प्रतिदिन माना गया है। इसका मतलब यह है कि बड़ी संख्या में श्रमिक कानूनी न्यूनतम वेतन से भी कम आय पर काम करने को मजबूर हैं। 1
विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल आय का मुद्दा नहीं बल्कि देश में बढ़ती आर्थिक असमानता का संकेत भी है। भारत के असंगठित क्षेत्र में करोड़ों लोग काम करते हैं और यही क्षेत्र छोटे व्यापार, स्थानीय सेवाओं और पारिवारिक उद्योगों की रीढ़ माना जाता है। इसके बावजूद इस क्षेत्र में रोजगार की गुणवत्ता, सामाजिक सुरक्षा और मजदूरी का स्तर लंबे समय से चिंता का विषय बना हुआ है।
यह आंकड़े Annual Survey of Unincorporated Sector Enterprises यानी ASUSE के विश्लेषण पर आधारित हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2022 में जहां असंगठित गैर-कृषि क्षेत्र में लगभग 59.7 मिलियन प्रतिष्ठान थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर 79.2 मिलियन तक पहुंच गई। हालांकि इनमें से करीब 86 प्रतिशत “own-account enterprises” हैं, यानी ऐसे छोटे कारोबार जिन्हें एक व्यक्ति या परिवार बिना नियमित कर्मचारियों के चलाता है। 2
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि बिना स्थायी दुकान या कार्यालय वाले कारोबारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सड़क किनारे दुकानें, मोबाइल सेवाएं, ठेले, छोटे घरेलू उत्पादन और अस्थायी कामकाज वाले व्यवसाय लगातार बढ़ रहे हैं। इसे अर्थव्यवस्था में रोजगार की मजबूरी और अस्थिर आय का संकेत माना जा रहा है। 3
अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत में असंगठित क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां काम करने वाले श्रमिकों को नियमित वेतन, बीमा, पेंशन या अन्य सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं नहीं मिलतीं। बड़ी संख्या में लोग दैनिक मजदूरी या अस्थायी अनुबंधों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में महंगाई बढ़ने के बावजूद उनकी आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाती।
कुछ हालिया रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि भारत में न्यूनतम वेतन व्यवस्था और वास्तविक मजदूरी के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। कई राज्यों में श्रमिकों को तय कानूनी वेतन से कम भुगतान किया जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में लगभग 64 प्रतिशत श्रमिक कानूनी वेतन सीमा से नीचे कमाई कर रहे हैं। 4
सामाजिक कार्यकर्ताओं और मजदूर संगठनों का कहना है कि स्थिति महिलाओं और प्रवासी श्रमिकों के लिए और ज्यादा कठिन है। असंगठित क्षेत्र में बड़ी संख्या में महिलाएं घरेलू काम, सिलाई, पैकेजिंग, छोटे उत्पादन कार्य और सेवा क्षेत्र में कम वेतन पर काम करती हैं। कई बार उन्हें न्यूनतम मजदूरी कानूनों की जानकारी तक नहीं होती।
हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश, हरियाणा और अन्य राज्यों में मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं। कई मजदूर संगठनों का आरोप है कि न्यूनतम वेतन बढ़ोतरी महंगाई के मुकाबले बेहद कम है और श्रमिकों की वास्तविक आय लगातार घट रही है। 5
सोशल मीडिया और ऑनलाइन मंचों पर भी इस मुद्दे को लेकर बहस तेज हुई है। कई लोगों ने सवाल उठाया कि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के बावजूद श्रमिकों की आय इतनी कम क्यों बनी हुई है। कुछ यूजर्स ने इसे “आर्थिक असमानता” और “कमजोर श्रम सुरक्षा” का परिणाम बताया। 6
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की आर्थिक वृद्धि का लाभ अभी भी समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा है। बड़ी कंपनियों और संगठित क्षेत्रों में वेतन वृद्धि देखने को मिलती है, लेकिन असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोग अब भी कम आय और असुरक्षित रोजगार की समस्या से जूझ रहे हैं।
नीति विशेषज्ञों के अनुसार इस स्थिति को सुधारने के लिए न्यूनतम वेतन कानूनों का सख्ती से पालन, श्रमिकों का पंजीकरण, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार और छोटे व्यवसायों को आर्थिक सहायता देना जरूरी होगा। इसके अलावा कौशल विकास और स्थायी रोजगार के अवसर बढ़ाने पर भी जोर देने की जरूरत बताई जा रही है।
भारत की अर्थव्यवस्था भले ही वैश्विक स्तर पर तेजी से आगे बढ़ रही हो, लेकिन यह रिपोर्ट याद दिलाती है कि विकास की असली तस्वीर तभी पूरी मानी जाएगी जब देश के सबसे कमजोर और मेहनतकश वर्ग की आय और जीवन स्तर में भी वास्तविक सुधार दिखाई दे।
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