चंडीगढ़। पंजाब में होने वाले निकाय चुनावों को लेकर राजनीतिक माहौल गर्माता जा रहा है। राज्य चुनाव आयोग की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि आगामी नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत चुनाव बैलट पेपर के जरिए कराए जाएंगे। इस फैसले के बाद भारतीय जनता पार्टी ने चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम के इस्तेमाल की मांग उठाई है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि ईवीएम के जरिए मतदान प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, तेज और व्यवस्थित होती है। पार्टी ने राज्य चुनाव आयोग से मांग की है कि निकाय चुनावों में भी ईवीएम का उपयोग किया जाए ताकि मतगणना जल्दी पूरी हो सके और चुनाव प्रक्रिया में किसी तरह की गड़बड़ी की आशंका कम हो।
भाजपा का कहना है कि देश के अधिकांश बड़े चुनाव ईवीएम के माध्यम से कराए जाते हैं, इसलिए स्थानीय निकाय चुनावों में बैलट पेपर का इस्तेमाल करना समझ से परे है। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि बैलट पेपर प्रणाली में विवाद और धांधली की संभावनाएं अधिक रहती हैं।
वहीं पंजाब सरकार और आम आदमी पार्टी के नेताओं का कहना है कि राज्य चुनाव आयोग स्वतंत्र संस्था है और चुनाव कराने का तरीका तय करना उसका अधिकार है। सरकार की ओर से अभी तक ईवीएम की मांग पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे को लेकर बहस तेज हो गई है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार होने के कारण विपक्ष इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से भी उठा रहा है। भाजपा इस फैसले को लेकर जनता के बीच पारदर्शिता और निष्पक्ष चुनाव का मुद्दा बना सकती है।
सूत्रों के मुताबिक निकाय चुनावों की तैयारियां तेजी से चल रही हैं और चुनाव आयोग जल्द ही चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर सकता है। राज्य के कई शहरों में राजनीतिक दलों ने प्रचार और संगठनात्मक गतिविधियां भी तेज कर दी हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बैलट पेपर और ईवीएम को लेकर बहस नई नहीं है। देश में समय-समय पर अलग-अलग राजनीतिक दल चुनाव प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। हालांकि भारत निर्वाचन आयोग लगातार ईवीएम को सुरक्षित और विश्वसनीय बताता रहा है।
पंजाब के निकाय चुनाव इस बार कई मायनों में अहम माने जा रहे हैं क्योंकि यह चुनाव राज्य की राजनीतिक स्थिति और जनता के मूड का संकेत भी दे सकते हैं। आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल सभी दल चुनावी तैयारियों में जुट गए हैं।
अब सभी की नजर राज्य चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों की अगली रणनीति पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा पंजाब की राजनीति में और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है।

