भारतीय रुपया सोमवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 96.35 पर बंद हुआ। विदेशी मुद्रा बाजार में लगातार गिरावट के बीच रुपया एक बार फिर दबाव में दिखाई दिया। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, विदेशी निवेशकों की निकासी और मजबूत अमेरिकी डॉलर इस गिरावट के प्रमुख कारण रहे।
इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 96.19 के स्तर पर खुला और कारोबार के दौरान गिरकर 96.39 तक पहुंच गया। अंत में यह 96.35 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ। इससे पहले शुक्रवार को भी रुपया पहली बार 96 प्रति डॉलर के स्तर के नीचे पहुंच गया था।
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर अतिरिक्त दबाव बनाया है। Brent crude की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं, जिससे भारत के आयात बिल में तेजी से वृद्धि की आशंका जताई जा रही है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपये पर दबाव आता है।
इसके साथ ही अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ने और डॉलर इंडेक्स मजबूत होने से उभरते बाजारों की मुद्राओं पर असर पड़ा है। निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं, जिसके चलते विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की निकासी भी बढ़ी है। विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजारों से पैसे निकालने पर डॉलर की मांग और अधिक बढ़ जाती है, जिससे रुपया कमजोर होता है।
रुपये की इस गिरावट का असर भारतीय अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है। आयात करने वाली कंपनियों के लिए लागत बढ़ सकती है, खासकर तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य विदेशी सामान पर निर्भर उद्योगों के लिए। इससे महंगाई पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है, जिसका असर आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
हालांकि कुछ सेक्टरों को कमजोर रुपये से फायदा भी हो सकता है। आईटी और फार्मा कंपनियां, जिनकी कमाई डॉलर में होती है, उन्हें रुपये के कमजोर होने से अतिरिक्त लाभ मिल सकता है क्योंकि डॉलर में होने वाली आय का मूल्य रुपये में अधिक हो जाता है।
Reserve Bank of India (RBI) की ओर से बाजार में हस्तक्षेप की भी चर्चा है। रिपोर्ट्स के अनुसार RBI रुपये की गिरावट को नियंत्रित करने के लिए डॉलर बेचकर हस्तक्षेप कर सकता है। हालांकि बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और वैश्विक तनाव कम नहीं होता, तो रुपये पर दबाव जारी रह सकता है।
सरकार ने विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह को नियंत्रित करने के लिए हाल के दिनों में सोना और चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाने जैसे कदम भी उठाए हैं। सरकार का मानना है कि गैर-जरूरी आयात कम करने से डॉलर की मांग को सीमित किया जा सकता है।
वित्तीय बाजारों में भी रुपये की गिरावट का असर देखने को मिला। शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ा और निवेशकों की चिंता साफ दिखाई दी। हालांकि आईटी सेक्टर में डॉलर मजबूत होने से कुछ बढ़त देखने को मिली।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में रुपये की दिशा काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों और पश्चिम एशिया की स्थिति पर निर्भर करेगी। फिलहाल बाजार की नजर RBI के अगले कदम और वैश्विक घटनाक्रम पर बनी हुई है।

