नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े माने जाने वाले अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (ABAP) के कार्यक्रमों में वर्तमान और पूर्व न्यायाधीशों की भागीदारी को लेकर देश में नई बहस शुरू हो गई है। इस मुद्दे ने न्यायपालिका की निष्पक्षता, वैचारिक संगठनों से संबंध और जजों की सार्वजनिक गतिविधियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाल ही में यह विवाद तब और बढ़ गया जब आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को लेकर अदालत में टिप्पणी की। केजरीवाल ने कहा कि जज RSS से जुड़े अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में शामिल होती रही हैं, ऐसे में निष्पक्षता को लेकर आशंकाएं पैदा होती हैं।
अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद की स्थापना वर्ष 1992 में RSS विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी द्वारा की गई थी। संगठन का दावा है कि उसका उद्देश्य भारतीय न्याय व्यवस्था में भारतीय सांस्कृतिक और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करना है। हालांकि विपक्षी दल और कुछ कानूनी विशेषज्ञ इसे RSS की वैचारिक इकाई के रूप में देखते हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, परिषद के विभिन्न कार्यक्रमों में कई वर्तमान और पूर्व न्यायाधीश शामिल हो चुके हैं। इनमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों के नाम भी सामने आए हैं। कुछ कार्यक्रमों में संवैधानिक मुद्दों, न्यायिक सुधारों और भारतीय न्याय व्यवस्था पर चर्चा की गई।
इस मुद्दे पर कानूनी विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है। कुछ पूर्व न्यायाधीशों का कहना है कि किसी कानूनी संगठन के कार्यक्रम में शामिल होना सामान्य पेशेवर गतिविधि है और इससे किसी जज की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। उनका मानना है कि जज विभिन्न मंचों पर जाकर कानूनी विषयों पर विचार साझा करते रहते हैं।
वहीं दूसरी ओर, कुछ वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों और पूर्व न्यायाधीशों का कहना है कि वैचारिक या राजनीतिक छवि वाले संगठनों के कार्यक्रमों में कार्यरत जजों की मौजूदगी से न्यायपालिका की स्वतंत्रता की छवि प्रभावित हो सकती है। उनका तर्क है कि न्यायपालिका को न केवल निष्पक्ष होना चाहिए बल्कि जनता के सामने निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए।
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज अभय एस. ओका ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यदि वे कार्यरत न्यायाधीश होते तो ऐसे किसी कार्यक्रम में शामिल होने से बचते। उनके अनुसार न्यायपालिका की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जजों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
रिपोर्टों के अनुसार, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद कई संवेदनशील और चर्चित कानूनी मुद्दों में सक्रिय रही है। इनमें राम जन्मभूमि विवाद, राम सेतु, गौ-तस्करी और मुस्लिम आरक्षण जैसे मामले शामिल बताए जाते हैं। संगठन खुद को राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक मूल्यों के समर्थन में काम करने वाला मंच बताता है।
इस पूरे विवाद के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। विपक्षी दलों ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई, जबकि भाजपा समर्थकों और परिषद से जुड़े लोगों ने आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया।
संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में न्यायपालिका लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ मानी जाती है। ऐसे में जजों की सार्वजनिक गतिविधियों और संगठनों से जुड़ाव को लेकर पारदर्शिता और संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है।
फिलहाल इस मामले पर कोई आधिकारिक न्यायिक टिप्पणी या जांच नहीं हुई है, लेकिन इस बहस ने न्यायपालिका और वैचारिक संगठनों के संबंधों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा शुरू कर दी है।

