महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर शिवसेना (यूबीटी) और एकनाथ शिंदे गुट के बीच टकराव तेज हो गया है। शिवसेना (यूबीटी) के नेता और पूर्व मंत्री आदित्य ठाकरे ने मंगलवार को महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें ‘फेकनाथ मिंदे’ कहा। आदित्य ठाकरे ने आरोप लगाया कि शिंदे विधानसभा में अपने विभागों से जुड़े सवालों का जवाब देने से लगातार बचते रहे हैं और अपनी जिम्मेदारियां दूसरे मंत्रियों पर डालते हैं।
मुंबई में पत्रकारों से बातचीत करते हुए आदित्य ठाकरे ने कहा कि विधानसभा के प्रश्नकाल में उठाए जाने वाले सवाल केवल विपक्ष के राजनीतिक हमले नहीं होते, बल्कि महाराष्ट्र की जनता से जुड़े अहम मुद्दे होते हैं। ऐसे में संबंधित विभाग के मंत्री का सदन में उपस्थित रहकर जवाब देना लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा है।
‘विभाग अपने पास रखते हैं, जवाब देने से बचते हैं’
आदित्य ठाकरे ने आरोप लगाया कि 2022 में महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के बाद से हर विधानसभा सत्र में एकनाथ शिंदे अपने विभागों से जुड़े सवालों का जवाब देने के बजाय किसी अन्य मंत्री को जिम्मेदारी सौंप देते हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई विभाग संभालने की क्षमता नहीं है तो उसे दूसरे मंत्री को स्थायी रूप से सौंप देना चाहिए।
ठाकरे ने कहा कि जनता के सवालों का जवाब देना मंत्री की जिम्मेदारी होती है, लेकिन शिंदे लगातार इससे बचते रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि यह प्रवृत्ति सरकार की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है।
भ्रष्टाचार और विभागों को लेकर लगाए आरोप
आदित्य ठाकरे ने आरोप लगाया कि विभागों को अपने पास रखने का मकसद केवल प्रशासनिक नियंत्रण नहीं बल्कि कथित तौर पर वित्तीय और राजनीतिक लाभ हासिल करना है। उन्होंने कहा कि अगर किसी विभाग का जवाब नहीं देना है तो उसे अपने पास रखने का कोई औचित्य नहीं है।
हालांकि उन्होंने कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया, लेकिन सरकार पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप लगाते हुए कहा कि विभागों के जरिए जनता के हितों की बजाय अन्य प्राथमिकताओं पर ध्यान दिया जा रहा है।
मुख्यमंत्री फडणवीस का उदाहरण देकर घेरा
शिवसेना (यूबीटी) नेता ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का उदाहरण देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री स्वयं अपने विभागों से जुड़े सवालों का जवाब देते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मुख्यमंत्री ऐसा कर सकते हैं तो उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे क्यों नहीं कर सकते।
आदित्य ठाकरे ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता और विपक्ष के सवालों से भागना उचित नहीं है। उन्होंने शिंदे पर सदन से दूरी बनाने और प्रत्यक्ष जवाबदेही से बचने का आरोप लगाया।
शिवसेना (यूबीटी) को झटका, छह सांसद शिंदे गुट में शामिल
आदित्य ठाकरे का यह हमला ऐसे समय में आया है जब शिवसेना (यूबीटी) को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। हाल ही में पार्टी के छह लोकसभा सांसदों ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया।
शिंदे गुट में शामिल होने वाले सांसदों में संजय हरिभाऊ जाधव, भाऊसाहेब वकचौरे, ओमप्रकाश निम्बालकर, संजय दीना पाटिल, संजय देशमुख और नागेश पाटिल अष्टीकर शामिल हैं। इस घटनाक्रम के बाद लोकसभा में उद्धव ठाकरे गुट की संख्या काफी घट गई है।
शिंदे ने बताया ‘विचारधारा बचाने का अभियान’
इन सांसदों के शामिल होने के बाद एकनाथ शिंदे ने इसे 2022 में शुरू हुए उस आंदोलन की निरंतरता बताया, जिसका उद्देश्य बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा को बचाना था। शिंदे ने कहा कि सांसद अपनी इच्छा से विकास कार्यों को गति देने और अपने क्षेत्रों के हित में उनके साथ आए हैं।
दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे सहित शिवसेना (यूबीटी) के नेताओं ने इसे जनादेश के साथ विश्वासघात बताया है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि सत्तारूढ़ गठबंधन राजनीतिक दबाव और शक्ति का उपयोग कर विपक्ष को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है।
50 नगरसेवकों के संपर्क में होने का दावा
इसी बीच हाल ही में शिंदे गुट में शामिल हुए सांसद संजय उत्तमराव देशमुख ने दावा किया है कि वाशिम और यवतमाल क्षेत्र के लगभग 50 नगरसेवक उनके संपर्क में हैं और वे भी शिंदे गुट में शामिल होने के इच्छुक हैं।
देशमुख ने उन आरोपों को भी खारिज किया जिनमें विपक्ष की ओर से केंद्रीय एजेंसियों के दबाव और कथित आर्थिक प्रलोभन की बात कही गई थी। उनका कहना है कि उन्होंने अपने क्षेत्र के विकास और लंबित परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए यह निर्णय लिया है।
महाराष्ट्र की राजनीति में बढ़ा तनाव
शिवसेना के विभाजन के बाद से महाराष्ट्र की राजनीति लगातार उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। एक ओर शिंदे गुट अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने में जुटा है, वहीं उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे पार्टी संगठन को मजबूत करने और बागी नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में महाराष्ट्र की राजनीति में और बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। विधानसभा के अंदर और बाहर दोनों जगह आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो चुका है, जिससे राज्य की राजनीतिक सरगर्मी लगातार बढ़ रही है।

