नई दिल्ली: भारत सरकार की स्टील कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) से जुड़े एक बड़े कथित घोटाले में अब उस कंपनी का नाम सामने आया है जिसने भाजपा को 30 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड दिए थे। इस कंपनी का नाम एपको इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड (APCO Infratech Pvt Ltd) है।
लोकपाल, केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा की गई जांच में आरोप लगाया गया है कि एपको और वेंकटेश इंफ्रा प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड (VIPPL) ने कुछ सेल अधिकारियों की कथित मिलीभगत से सरकारी कंपनी सेल को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचाया।
क्या है पूरा मामला?
शिकायतों के अनुसार सेल ने 100 से अधिक कंपनियों को निर्माण कार्य (Construction Projects) के नाम पर 11 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा स्टील रियायती दरों पर बेचा। आरोप है कि इनमें से कई कंपनियां वास्तव में कोई निर्माण कार्य नहीं कर रही थीं।
इन कंपनियों ने सेल से सस्ते दाम पर स्टील खरीदा और बाद में बाजार में ऊंचे दाम पर बेच दिया। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि इससे सेल को 400 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ।
सबसे ज्यादा फायदा VIPPL को मिला
जांच एजेंसियों के अनुसार इस कथित अनियमितता का सबसे बड़ा लाभार्थी वेंकटेश इंफ्रा प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड (VIPPL) रही।
20 अक्टूबर 2020 को सेल ने VIPPL के साथ एक समझौता (MOU) किया जिसके तहत एक साल में 1.5 लाख मीट्रिक टन स्टील की आपूर्ति की जानी थी।
आरोप है कि VIPPL कोई सक्रिय निर्माण कंपनी नहीं थी, फिर भी उसे निर्माण कंपनियों के लिए मिलने वाली विशेष छूट दी गई।
जांच में यह भी सामने आया कि VIPPL का गठन सिर्फ 12 अक्टूबर 2020 को हुआ था और मात्र 8 दिन बाद उसने देश की सबसे बड़ी सरकारी स्टील कंपनी के साथ बड़ा करार कर लिया।
एपको का प्रमाण पत्र बना आधार
सेल ने VIPPL के साथ करार करने के लिए एपको इंफ्राटेक द्वारा जारी एक प्रमाण पत्र को आधार बनाया था।
हैरानी की बात यह है कि VIPPL का गठन 12 अक्टूबर 2020 को हुआ जबकि एपको ने 12 सितंबर 2020 को ही प्रमाण पत्र जारी कर दिया था कि VIPPL उसके साथ 11 इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है और उसका प्रदर्शन संतोषजनक है।
इस प्रमाण पत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की परियोजनाओं का भी उल्लेख किया गया था।
NHAI ने क्या बताया?
जब सेल की सतर्कता शाखा ने जांच की तो NHAI ने बताया कि एपको उनके साथ तीन परियोजनाओं पर काम कर रही थी लेकिन इनमें कहीं भी VIPPL सब-कॉन्ट्रैक्टर नहीं थी।
इसके बाद सेल के मुख्य सतर्कता अधिकारी (CVO) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि एपको और VIPPL के बीच लंबे समय से कारोबारी संबंध होने का दावा विश्वसनीय नहीं लगता।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि एपको और VIPPL का व्यावसायिक गठजोड़ ही पूरे मामले की जड़ है।
स्टील दूसरी कंपनियों को भेजा गया
जांच में यह भी सामने आया कि VIPPL ने सेल से खरीदे गए लगभग 1.24 लाख मीट्रिक टन स्टील को अपनी कथित निर्माण साइटों पर न भेजकर अन्य कंपनियों के पते पर भेजा।
इससे संदेह पैदा हुआ कि VIPPL निर्माण कार्य करने के बजाय स्टील की ट्रेडिंग कर रही थी और रियायती दरों का फायदा उठा रही थी।
एपको ने क्या सफाई दी?
मार्च 2023 में सेल विजिलेंस ने एपको से पूछा कि उसने VIPPL को प्रमाण पत्र क्यों दिया था और संबंधित वर्क ऑर्डर की प्रतियां मांगीं।
एपको ने जवाब में कहा कि VIPPL की प्रमोटर एकता अग्रवाल से उनके पुराने संबंध हैं और कंपनी पहले दूसरे नाम से काम करती थी।
एपको ने यह भी कहा कि पुराने प्रोजेक्ट्स बंद हो चुके हैं इसलिए संबंधित वर्क ऑर्डर उपलब्ध नहीं हैं।
साथ ही कंपनी ने दावा किया कि यह प्रमाण पत्र सेल के लिए जारी नहीं किया गया था।
लेकिन जांच एजेंसियों ने सवाल उठाया कि यदि प्रमाण पत्र सेल के लिए नहीं था तो सेल ने उसी आधार पर VIPPL को विशेष श्रेणी का ग्राहक कैसे मान लिया।
भाजपा को 30 करोड़ रुपये का चंदा
चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार एपको इंफ्राटेक ने 15 जनवरी 2020 से 12 अक्टूबर 2023 के बीच कुल 30 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड खरीदे थे।
रिकॉर्ड के मुताबिक ये सभी बॉन्ड भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भुनाए थे।
एपको देश के कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में काम कर रही है, जिनमें दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे, जम्मू-कश्मीर की Z-मोड़ सुरंग, मुंबई का केबल-स्टे ब्रिज और दिल्ली-एनसीआर के कई मेट्रो प्रोजेक्ट शामिल हैं।
लोकपाल ने क्या कहा?
10 जनवरी 2024 के आदेश में लोकपाल ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि सेल अधिकारियों ने आवश्यक सावधानी नहीं बरती, जिसके कारण VIPPL को अन्य ग्राहकों की तुलना में कम दरों पर स्टील उपलब्ध कराया गया।
लोकपाल ने कहा कि यह केवल आर्थिक नुकसान का मामला नहीं है बल्कि यह भी जांच का विषय है कि क्या सिस्टम के साथ जानबूझकर छेड़छाड़ की गई।
लोकपाल ने माना कि कुछ अधिकारियों की VIPPL के साथ मिलीभगत की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
CBI ने दर्ज की FIR
लोकपाल के निर्देश के बाद CBI ने 10 अक्टूबर 2024 को FIR दर्ज की।
FIR में सेल के कुछ अधिकारियों, VIPPL और एपको इंफ्राटेक को आरोपी बनाया गया है।
मामला आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज किया गया है।
29 अधिकारी निलंबित, बाद में बहाल
जनवरी 2024 में इस्पात मंत्रालय ने सेल और अन्य सार्वजनिक उपक्रमों के कुल 29 अधिकारियों को निलंबित कर दिया था।
इनमें सेल के निदेशक (वाणिज्यिक) वी.एस. चक्रवर्ती, निदेशक (वित्त) ए.के. तुलसियानी और कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे।
हालांकि 2024 के आम चुनावों के बाद जून में सभी अधिकारियों को बहाल कर दिया गया।
व्हिसलब्लोअर को समय से पहले रिटायर किया गया
इस पूरे मामले को सबसे पहले सामने लाने वाले सेल के तत्कालीन जनरल मैनेजर राजीव भाटिया थे।
उन्होंने नवंबर 2022 में तत्कालीन सेल अध्यक्ष सोमा मंडल और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायत भेजी थी।
शिकायत के एक सप्ताह बाद ही उन्हें निलंबित कर दिया गया था।बाद में उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय और लोकपाल से भी शिकायत की।लेकिन फरवरी 2026 में सेल ने उन्हें कुछ अन्य अधिकारियों के साथ समय से पहले सेवानिवृत्त कर दिया।
सेल का कहना था कि ये अधिकारी "ईमानदारी और जवाबदेही" के मानकों पर खरे नहीं उतरे।
अन्य कंपनियां भी जांच के घेरे में
लोकपाल के पास ऐसी कुल 43 कंपनियों के खिलाफ शिकायतें पहुंची हैं जिन पर निर्माण कार्य के नाम पर सेल की नीतियों का गलत फायदा उठाने का आरोप है। इन मामलों की जांच अभी भी विभिन्न एजेंसियों द्वारा की जा रही है।
आरोपियों का पक्ष
द वायर की रिपोर्ट के अनुसार इस मामले में सेल, एपको और VIPPL से संपर्क किया गया था। सेल ने आधिकारिक टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, जबकि एपको और VIPPL की ओर से खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला था।
मुख्य बिंदु
- एपको इंफ्राटेक ने भाजपा को 30 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड दिए थे।
- CBI ने सेल स्टील आपूर्ति मामले में FIR दर्ज की है।
- VIPPL को 1.5 लाख मीट्रिक टन स्टील आपूर्ति का करार मिला था।
- लोकपाल ने सेल अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
- 43 अन्य कंपनियों के खिलाफ भी शिकायतें जांच के दायरे में हैं।
- मामले में धोखाधड़ी, जालसाजी और भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच जारी है।

