अभिजीत दिपके की भारत वापसी और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग: नीट विवाद और युवाओं का बढ़ता आंदोलन

Praveen Yadav
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देश की राजनीति में इन दिनों 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) का नाम तेजी से सुर्खियों में है। परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं और लाखों छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ के आरोपों के बीच, CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने केंद्र सरकार, विशेषकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। 6 जून को अपनी भारत वापसी और एक बड़े शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की घोषणा ने शिक्षा जगत और राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है ।

देश की राजनीति में इन दिनों 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) का नाम तेजी से सुर्खियों में है। परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं और लाखों छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ के आरोपों के बीच, CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने केंद्र सरकार, विशेषकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। 6 जून को अपनी भारत वापसी और एक बड़े शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की घोषणा ने शिक्षा जगत और राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है ।


NEET और अन्य परीक्षाओं का विवाद: क्यों भड़के हैं छात्र?

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में शिक्षा मंत्रालय पर पिछले कुछ महीनों से सवालों का साया है। NEET-UG 2026 परीक्षा में कथित पेपर लीक, उसके बाद परीक्षा रद्द होने और फिर दोबारा आयोजन की प्रक्रिया ने छात्रों में गहरा असंतोष पैदा किया है। इसके अलावा, CBSE की पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया और CUET व SSC GD जैसी प्रमुख परीक्षाओं में आ रही तकनीकी दिक्कतों ने करीब 1 करोड़ से अधिक छात्रों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिए हैं ।


अभिजीत दिपके और उनके समर्थकों का तर्क है कि जब इतनी बड़ी विफलताएं सामने हों, तो नैतिक आधार पर शिक्षा मंत्री को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। दिपके का कहना है, "अगर इतनी बड़ी गलती के बाद भी शिक्षा मंत्री इस्तीफा नहीं देते, तो इसका मतलब है कि हमारे देश में जवाबदेही (Accountability) नाम की कोई चीज नहीं बची है।"


कॉकरोच जनता पार्टी (CJP): एक नए सोशल मीडिया आंदोलन का उदय

कॉकरोच जनता पार्टी का उदय पिछले महीने ही हुआ है, लेकिन बहुत ही कम समय में इसने युवाओं के बीच अपनी पैठ बना ली है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Instagram और X (पूर्व में Twitter) का उपयोग करते हुए, दिपके ने एक ऐसा मंच तैयार किया है जो मुख्यधारा की राजनीति से परे जाकर सीधे Gen-Z और छात्रों की चिंताओं को संबोधित करता है ।


इस आंदोलन की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग वाली एक ऑनलाइन याचिका पर अब तक 8 लाख से अधिक हस्ताक्षर हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में छात्र और युवा इस मुद्दे पर सड़कों पर उतर रहे हैं, जो इस बात का संकेत है कि यह मुद्दा केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है ।


6 जून का प्लान: एयरपोर्ट से जंतर-मंतर तक

अभिजीत दिपके ने अपनी भारत वापसी के लिए एक विस्तृत रूपरेखा तैयार की है। 6 जून की सुबह जब वे दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचेंगे, तो उन्होंने अपने समर्थकों से वहां एकत्रित होने की अपील की है। उनका उद्देश्य एयरपोर्ट से सीधे संसद मार्ग थाने जाना है, ताकि जंतर-मंतर पर एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन की आधिकारिक अनुमति प्राप्त की जा सके ।


दिपके को इस बात का इल्म है कि उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है। उन्होंने एक वीडियो संदेश में कहा, "मेरे परिवार और दोस्तों को डर है कि भारत पहुंचते ही मुझे जेल भेजा जा सकता है। लेकिन मैं सवाल पूछता हूं, हम कब तक डर के साये में जीते रहेंगे? मैं महात्मा गांधी, बी.आर. आंबेडकर, भगत सिंह और जवाहरलाल नेहरू के आदर्शों में विश्वास रखता हूं और मुझे हमारे लोकतंत्र व संविधान पर भरोसा है।"

राजनीतिक प्रभाव और धर्मेंद्र प्रधान की चुनौती

धर्मेंद्र प्रधान, जो पहले से ही विपक्षी दलों (कांग्रेस आदि) के निशाने पर हैं, अब अभिजीत दिपके जैसे युवा नेतृत्व वाले आंदोलन से और अधिक दबाव में हैं। हालांकि सरकार की ओर से बार-बार यह कहा जा रहा है कि वे परीक्षाओं की शुचिता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन छात्रों के बीच बढ़ता आक्रोश किसी बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहा है ।


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह विरोध प्रदर्शन सफल रहता है, तो यह आगामी चुनावों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। कॉकरोच जनता पार्टी जिस तरह से 'युवा शक्ति' को एकजुट कर रही है, वह पारंपरिक पार्टियों के लिए चिंता का विषय है ।


निष्कर्ष: जवाबदेही की जंग

यह लड़ाई केवल एक इस्तीफे की नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था के खिलाफ है जो लाखों छात्रों के सपनों को धूल में मिला रही है। अभिजीत दिपके का आंदोलन एक बार फिर याद दिलाता है कि जब लोकतंत्र में जनता, विशेषकर युवा, अपनी आवाज उठाती है, तो सत्ता के गलियारों में हलचल होना स्वाभाविक है। 6 जून को दिल्ली की सड़कों पर क्या होगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि शिक्षा के प्रति छात्रों की यह जागरूकता एक बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती है ।

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