नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके परिवार द्वारा उज्जैन एवं आसपास के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जमीन खरीदने को लेकर राजनीतिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है। एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद यादव परिवार, रिश्तेदारों और उनसे जुड़ी कंपनियों ने लगभग 168 एकड़ भूमि खरीदी है। इन जमीनों की घोषित कीमत करीब 45 करोड़ रुपये बताई गई है। खास बात यह है कि इन जमीनों का बड़ा हिस्सा उन क्षेत्रों में स्थित है जहां राज्य सरकार की ओर से हाईवे, सड़क विस्तार और मास्टर प्लान के तहत विकास परियोजनाएं प्रस्तावित हैं।
यह मामला सामने आने के बाद विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया है, जबकि परिवार का कहना है कि वे वर्षों से रियल एस्टेट कारोबार में सक्रिय हैं और सभी खरीदारी पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई है।
क्या है पूरा मामला?
रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2023 में मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके परिवार और उनसे जुड़ी कंपनियों ने उज्जैन जिले और आसपास के क्षेत्रों में कम से कम 137 भूखंड खरीदे। इन भूखंडों का कुल क्षेत्रफल लगभग 168 एकड़ बताया गया है।
जमीन खरीदने वालों में मुख्यमंत्री की पत्नी सीमा यादव, पुत्रवधू शालिनी यादव, भाई नंदलाल यादव, नारायण यादव, नारायण यादव की पत्नी रेखा यादव, अभय यादव और अन्य रिश्तेदारों के नाम शामिल बताए गए हैं। कुछ जमीनें सीधे तौर पर खरीदी गईं जबकि कुछ परिवार से जुड़ी रियल एस्टेट कंपनियों के माध्यम से ली गईं।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद जमीन खरीद की गति पहले की तुलना में काफी बढ़ गई।
पहले से भी था बड़ा भूमि बैंक
जानकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री बनने से पहले भी यादव परिवार उज्जैन क्षेत्र में बड़ा भूमि बैंक रखता था। परिवार के पास लगभग 179 एकड़ भूमि पहले से मौजूद थी। इनमें से बड़ी मात्रा में जमीन वर्ष 2021 से 2023 के बीच खरीदी गई थी, जब मोहन यादव मध्य प्रदेश सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री थे।
हालांकि मुख्यमंत्री बनने के बाद नई खरीदारी का पैमाना और अधिक बड़ा दिखाई देता है। इसी कारण यह मामला राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।
हाईवे परियोजनाओं के आसपास खरीदी गई जमीन
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद खरीदी गई 168 एकड़ जमीन में से लगभग 111 एकड़ भूमि ऐसे क्षेत्रों में स्थित है जहां नई सड़क या हाईवे परियोजनाएं प्रस्तावित हैं या निर्माणाधीन हैं।
इन इलाकों में गंगेड़ी, उनहेल, जयवंतपुरा, चंदेसरा, कराडिया और करोंदिया जैसे क्षेत्र शामिल बताए गए हैं। रियल एस्टेट विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क और परिवहन नेटवर्क के विस्तार के बाद इन क्षेत्रों की जमीनों की कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है।
गंगेड़ी क्षेत्र में परिवार से जुड़े लोगों द्वारा लगभग 51 एकड़ जमीन खरीदने की बात सामने आई है। यह इलाका उज्जैन-इंदौर और उज्जैन-बड़नगर मार्गों के महत्वपूर्ण जंक्शन के पास स्थित है।
इसी तरह उनहेल क्षेत्र में प्रस्तावित उज्जैन-नागदा हाईवे के आसपास लगभग 29 एकड़ भूमि खरीदी गई बताई गई है।
मास्टर प्लान 2035 से जुड़ा मामला
उज्जैन मास्टर प्लान 2035 को भी इस पूरे विवाद का अहम हिस्सा माना जा रहा है। मास्टर प्लान के तहत कई कृषि क्षेत्रों को भविष्य में आवासीय और व्यावसायिक उपयोग के लिए चिन्हित किया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पांड्याखेड़ी क्षेत्र में परिवार ने लगभग 18 एकड़ भूमि खरीदी है। इस क्षेत्र को भविष्य के व्यावसायिक विकास क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया है।
इसके अलावा सावराखेड़ी, नानाखेड़ा और ढेढ़िया जैसे क्षेत्रों में भी परिवार की जमीनें मौजूद होने की बात कही गई है। शहरी विस्तार और बुनियादी ढांचे के विकास के कारण इन इलाकों की भूमि का मूल्य भविष्य में तेजी से बढ़ सकता है।
विपक्ष ने लगाए गंभीर आरोप
मध्य प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने इस मामले को लेकर सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि जिन क्षेत्रों में भूमि उपयोग परिवर्तन और विकास योजनाएं प्रस्तावित की गईं, वहां पहले से ही परिवार की बड़ी हिस्सेदारी मौजूद थी या बाद में बड़े पैमाने पर निवेश किया गया।
पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा समेत कई कांग्रेस नेताओं ने पहले भी उज्जैन मास्टर प्लान को लेकर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि कुछ क्षेत्रों में भूमि उपयोग परिवर्तन से विशेष वर्गों को लाभ पहुंच सकता है।
हालांकि अब तक विपक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों की किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा पुष्टि नहीं की गई है।
मुख्यमंत्री कार्यालय की प्रतिक्रिया
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री कार्यालय को इस संबंध में सवाल भेजे गए थे, लेकिन कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई।
हालांकि सरकार के कुछ अधिकारियों ने अनौपचारिक रूप से कहा है कि मुख्यमंत्री के विस्तारित परिवार के व्यावसायिक निर्णयों को सीधे सरकारी नीतियों से जोड़ना उचित नहीं है।
उनका कहना है कि परिवार लंबे समय से रियल एस्टेट कारोबार में सक्रिय है और जमीन खरीदना उनकी सामान्य व्यावसायिक गतिविधियों का हिस्सा है।
परिवार का पक्ष
मुख्यमंत्री के रिश्तेदारों की ओर से कहा गया है कि वे वर्षों से जमीन विकास और रियल एस्टेट व्यवसाय में काम कर रहे हैं। परिवार का कहना है कि निजी नागरिक होने के नाते उन्हें जमीन खरीदने और बेचने का कानूनी अधिकार है।
परिवार से जुड़े लोगों ने यह भी कहा है कि कुछ जमीन सौदे मुख्यमंत्री बनने से पहले शुरू हो चुके थे। उनके अनुसार कई क्षेत्रों में सड़क परियोजनाओं की मंजूरी भी वर्षों पहले मिल चुकी थी, इसलिए इन निवेशों को मुख्यमंत्री पद से जोड़ना उचित नहीं है।
परिवार का दावा है कि सभी खरीद-बिक्री पूरी तरह पारदर्शी और कानूनी प्रक्रिया के तहत हुई है।
रियल एस्टेट कंपनियों की भूमिका
रिपोर्ट के अनुसार, परिवार से जुड़ी कुछ कंपनियां उज्जैन क्षेत्र में आवासीय परियोजनाएं विकसित कर रही हैं। बताया गया है कि कुछ भूखंड बाद में बिल्डरों को विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित किए गए।
परिवार से जुड़ी कंपनियों द्वारा ‘सांवरिया’ ब्रांड के तहत नई हाउसिंग परियोजनाएं शुरू किए जाने का भी उल्लेख किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उज्जैन में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और धार्मिक पर्यटन के कारण रियल एस्टेट क्षेत्र में निवेश की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
कानूनी और नैतिक बहस
फिलहाल इस मामले में किसी जांच एजेंसी ने कोई अनियमितता या कानून उल्लंघन साबित नहीं किया है। इसलिए कानूनी दृष्टि से कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मामला केवल कानूनी नहीं बल्कि नैतिक और राजनीतिक भी है। जब कोई व्यक्ति राज्य का मुख्यमंत्री होता है, तब उसके परिवार द्वारा बड़े पैमाने पर संपत्ति निवेश को लेकर स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक सवाल उठते हैं।
वहीं दूसरी ओर समर्थकों का कहना है कि किसी भी नागरिक को वैध तरीके से निवेश करने का अधिकार है और केवल जमीन खरीद लेने को गलत नहीं माना जा सकता।
आगे क्या?
यह मामला आने वाले दिनों में मध्य प्रदेश की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है। विपक्ष सरकार से जवाब मांग रहा है, जबकि भाजपा इसे सामान्य व्यावसायिक गतिविधि बता रही है।
यदि राजनीतिक दबाव बढ़ता है तो इस मुद्दे पर अधिक पारदर्शिता और विस्तृत स्पष्टीकरण की मांग भी उठ सकती है। फिलहाल यह विवाद राजनीतिक बयानबाजी और सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में बना हुआ है।
मध्य प्रदेश की राजनीति में यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह विकास परियोजनाओं, भूमि निवेश और राजनीतिक जवाबदेही जैसे कई संवेदनशील मुद्दों को एक साथ सामने लाता है। आने वाले समय में इस पर सरकार, विपक्ष और संबंधित पक्षों की प्रतिक्रियाएं इस बहस की दिशा तय करेंगी।

