नई दिल्ली: 25 जून 1975 को लगाए गए आपातकाल (Emergency) की 51वीं वर्षगांठ पर देशभर में "संविधान हत्या दिवस" (Samvidhan Hatya Diwas) मनाया जा रहा है। इस अवसर पर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय बताते हुए कहा कि उस दौर में लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक अधिकारों और संविधान की मूल भावना को गंभीर चोट पहुंचाई गई थी।
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट साझा करते हुए कहा कि 25 जून 1975 की रात भारतीय लोकतंत्र के लिए एक ऐसा दिन था जिसे देश कभी नहीं भूल सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने सत्ता के अहंकार में लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचल दिया था।
रेखा गुप्ता बोलीं, लोकतंत्र और संविधान पर हुआ था सबसे बड़ा प्रहार
मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र और संविधान पर सबसे बड़ा हमला था। उन्होंने कहा कि उस समय प्रेस की स्वतंत्रता पर ताले लगा दिए गए थे, नागरिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया था और अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंट दिया गया था।
रेखा गुप्ता ने कहा कि सत्ता के दुरुपयोग का यह उदाहरण आज भी भारतीय राजनीति में एक चेतावनी के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने दावा किया कि उस दौर में लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले हजारों लोगों को जेलों में बंद किया गया और उन्हें अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ीं।
कांग्रेस पर लगाया तानाशाही मानसिकता का आरोप
दिल्ली मुख्यमंत्री ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि आपातकाल लगाने का निर्णय पार्टी की तानाशाही सोच का सबसे बड़ा प्रतीक था। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस आज भी उसी मानसिकता से ग्रसित है और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उसका रवैया नहीं बदला है।
उन्होंने कहा कि संविधान हत्या दिवस केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए संकल्प लेने का दिन भी है।
मनोहर लाल खट्टर ने भी आपातकाल को बताया लोकतंत्र पर हमला
केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी आपातकाल की वर्षगांठ पर लोकतंत्र सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि 25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र का वह काला दिन है जिसकी भयावहता को देश कभी नहीं भूल सकता।
खट्टर ने कहा कि कांग्रेस ने सत्ता को लोकतंत्र और संविधान से ऊपर रखा और रातोंरात पूरे देश पर आपातकाल थोप दिया। उन्होंने उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि दी जिन्होंने लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष किया और कठिन परिस्थितियों का सामना किया।
क्या था 1975 का आपातकाल?
भारत में आपातकाल 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक लागू रहा। इसे स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे विवादास्पद राजनीतिक दौरों में से एक माना जाता है। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत "आंतरिक अशांति" (Internal Disturbance) का हवाला देते हुए आपातकाल की घोषणा की थी।
आपातकाल की पृष्ठभूमि में बढ़ता राजनीतिक विरोध, आर्थिक चुनौतियां और इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला था, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनावी अनियमितताओं का दोषी ठहराया गया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने बढ़ाया था राजनीतिक संकट
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने रायबरेली लोकसभा चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी मानते हुए इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया था। अदालत ने उन्हें छह वर्षों तक किसी भी निर्वाचित पद पर रहने के अयोग्य ठहराया था।
यह मामला समाजवादी नेता राज नारायण द्वारा दायर किया गया था, जिन्होंने 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा था। फैसले के बाद देश में राजनीतिक संकट गहरा गया और विपक्ष ने इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग तेज कर दी।
जेपी आंदोलन और बढ़ता जन असंतोष
1970 के दशक की शुरुआत में बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा था। बिहार और गुजरात में छात्र आंदोलनों ने व्यापक रूप लिया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया था।
जेपी आंदोलन ने देशभर में लोकतांत्रिक सुधारों और जवाबदेही की मांग को मजबूत किया। लाखों लोग इस आंदोलन से जुड़े और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे।
आपातकाल के दौरान क्या हुआ?
आपातकाल लागू होने के बाद सरकार ने संविधान के कई प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगा दिए। अनुच्छेद 358 और 359 के तहत कई मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता और विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए। विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को बड़ी संख्या में गिरफ्तार किया गया।
जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी सहित कई प्रमुख विपक्षी नेता जेल भेज दिए गए। मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (MISA) के तहत हजारों लोगों को बिना मुकदमे के हिरासत में रखा गया।
प्रेस सेंसरशिप और नागरिक अधिकारों पर असर
26 जून 1975 से देशभर के समाचार पत्रों पर प्री-सेंसरशिप लागू कर दी गई थी। अखबारों को समाचार, संपादकीय और तस्वीरें प्रकाशित करने से पहले सरकारी अनुमति लेनी पड़ती थी।
रेडियो और अन्य संचार माध्यमों को भी सरकारी नियंत्रण में रखा गया। आलोचनात्मक रिपोर्टिंग लगभग असंभव हो गई थी और मीडिया की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े हुए।
1977 में समाप्त हुआ आपातकाल
लगभग 21 महीनों तक लागू रहने के बाद 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त कर दिया गया। इसके बाद लोकसभा चुनाव कराए गए, जिनमें जनता पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।
चुनाव परिणामों को भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक माना गया क्योंकि जनता ने मतदान के माध्यम से अपनी राय स्पष्ट रूप से व्यक्त की।
संविधान हत्या दिवस क्यों मनाया जाता है?
भारत सरकार ने 25 जून को "संविधान हत्या दिवस" के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इसका उद्देश्य आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों पर पड़े प्रभाव को याद करना तथा भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है, जो यह याद दिलाता है कि संविधान और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए निरंतर सतर्क रहना आवश्यक है।

