नई दिल्ली: शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) को लोकसभा सांसदों की बगावत से बड़ा झटका लगने के बाद अब पार्टी के सामने एक और गंभीर संकट खड़ा हो गया है। छह सांसदों के शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) में शामिल होने के बाद न केवल उद्धव गुट की संसदीय ताकत कमजोर हुई है, बल्कि संसद भवन परिसर में पार्टी को आवंटित कार्यालय भी खतरे में पड़ सकता है।
राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को उद्धव ठाकरे के लिए एक और बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में हार, संगठनात्मक कमजोरियों और लगातार नेताओं के पलायन के बीच अब संसद में भी पार्टी की स्थिति कमजोर होती दिखाई दे रही है।
6 सांसदों के जाने से घटेगी संसदीय ताकत
सूत्रों के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष द्वारा औपचारिक मंजूरी मिलने के बाद शिवसेना (यूबीटी) के संसदीय दल में सांसदों की संख्या घटकर केवल चार रह जाएगी। वर्तमान में पार्टी के छह सांसदों ने बगावत कर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया है।
इस घटनाक्रम के बाद संसद में पार्टी का प्रतिनिधित्व पहले की तुलना में काफी सीमित हो जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव आने वाले समय में पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका को भी प्रभावित कर सकता है।
संसद कार्यालय पर क्यों मंडरा रहा है खतरा?
संसदीय नियमों के अनुसार सामान्यतः संसद भवन परिसर में अलग कार्यालय उन्हीं दलों को आवंटित किया जाता है जिनके लोकसभा में कम से कम पांच सांसद हों। यदि किसी दल की संख्या पांच से कम हो जाती है, तो कार्यालय आवंटन की समीक्षा की जा सकती है।
शिवसेना (यूबीटी) के पास सांसदों की संख्या घटकर चार रह जाने की स्थिति में संसद परिसर में स्थित उसका मौजूदा कार्यालय भी छिन सकता है। फिलहाल पार्टी का संसदीय कार्यालय संविधान सदन (पुराना संसद भवन) के कमरा नंबर 128A में स्थित है।
यह कार्यालय अविभाजित शिवसेना को आवंटित ऐतिहासिक कमरा नंबर 128 के ठीक बगल में स्थित है और वर्षों से पार्टी की संसदीय गतिविधियों का केंद्र रहा है।
सर्वदलीय बैठकों में भागीदारी पर भी असर संभव
सांसदों की संख्या में कमी का असर केवल कार्यालय तक सीमित नहीं रह सकता। संसद और केंद्र सरकार द्वारा महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर बुलाई जाने वाली सर्वदलीय बैठकों में आमतौर पर उन दलों को प्राथमिकता दी जाती है जिनके लोकसभा में पर्याप्त सांसद होते हैं।
ऐसी स्थिति में पांच से कम सांसदों वाली पार्टी होने के कारण शिवसेना (यूबीटी) की भागीदारी कई महत्वपूर्ण बैठकों में प्रभावित हो सकती है। इससे राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की राजनीतिक उपस्थिति और प्रभाव दोनों कम हो सकते हैं।
उद्धव ठाकरे के लिए बढ़ी राजनीतिक चुनौती
महाराष्ट्र की राजनीति में पहले ही शिवसेना के विभाजन का सामना कर चुके उद्धव ठाकरे के लिए यह नया संकट संगठन को मजबूत बनाए रखने की चुनौती लेकर आया है। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को चुनाव आयोग और विधानसभा में पहले ही बड़ी बढ़त मिल चुकी है।
अब लोकसभा में सांसदों की संख्या घटने से उद्धव गुट की राजनीतिक स्थिति और कमजोर होती दिखाई दे रही है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में पार्टी को अपने संगठन और जनाधार को मजबूत करने के लिए नई रणनीति बनानी होगी।
शिंदे गुट को मिला बड़ा फायदा
दूसरी ओर, छह सांसदों के शामिल होने से मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना को संसद में और मजबूती मिली है। इससे शिंदे गुट का दावा और मजबूत होगा कि वही बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत का वास्तविक उत्तराधिकारी है।
हाल ही में मुख्यमंत्री शिंदे ने बागी सांसदों का स्वागत करते हुए कहा था कि उनकी पार्टी लगातार मजबूत हो रही है और महाराष्ट्र की जनता का समर्थन उन्हें मिल रहा है।
आगे क्या होगा?
अब सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के अंतिम फैसले पर टिकी हैं। यदि सांसदों के विलय को आधिकारिक मंजूरी मिल जाती है, तो शिवसेना (यूबीटी) को संसद में अपनी स्थिति बचाने के लिए नई रणनीति बनानी पड़ सकती है।
कार्यालय आवंटन, संसदीय पहचान और राजनीतिक प्रभाव जैसे मुद्दे आने वाले दिनों में उद्धव ठाकरे के सामने बड़ी चुनौती बन सकते हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में यह घटनाक्रम शिवसेना के दोनों गुटों के बीच जारी शक्ति संघर्ष का नया अध्याय माना जा रहा है।
निष्कर्ष: छह सांसदों की बगावत के बाद शिवसेना (यूबीटी) केवल राजनीतिक ही नहीं बल्कि संसदीय स्तर पर भी बड़े संकट का सामना कर रही है। यदि सांसदों के विलय को मंजूरी मिलती है, तो पार्टी संसद में अपना कार्यालय खो सकती है और उसकी राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका भी सीमित हो सकती है।

