उत्तर प्रदेश मतदाता सूची 2026 को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है। विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण (SIR) के बाद तैयार की गई नई मतदाता सूची के विश्लेषण में पाया गया है कि राज्य में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 0.9 प्रतिशत बढ़ी है। इतना ही नहीं, हाल ही में जुड़े नए मतदाताओं में करीब 35 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय से हैं। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद प्रशासनिक स्तर पर सत्यापन की तैयारी शुरू कर दी गई है।
मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी 18.6% से बढ़कर 19.5%
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण (SIR) से पहले उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 18.6 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 19.5 प्रतिशत हो गई है। यह वृद्धि लगभग 0.9 प्रतिशत दर्ज की गई है।
हालांकि, मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि चुनाव आयोग धर्म के आधार पर मतदाताओं का आधिकारिक आंकड़ा नहीं रखता है। यह आंकड़े राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषणों पर आधारित बताए जा रहे हैं।
18-21 आयु वर्ग में 25% मुस्लिम मतदाता
विश्लेषण में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाला तथ्य युवा मतदाताओं से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, 18 से 21 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत दर्ज की गई है।
वहीं 18 से 40 वर्ष आयु वर्ग में मुस्लिम मतदाता करीब 22 प्रतिशत बताए गए हैं। नए मतदाता बनने के लिए भरे गए फॉर्म-6 में भी मुस्लिम युवाओं की भागीदारी काफी अधिक देखने को मिली है।
नए मतदाताओं में 35% मुस्लिम समुदाय से
मतदाता सूची में शामिल हुए नए वोटरों का विश्लेषण करने पर सामने आया कि कुल नए मतदाताओं में लगभग 35 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय से हैं। इसे लेकर राजनीतिक दल अपने-अपने स्तर पर आंकड़ों का अध्ययन कर रहे हैं और आगामी चुनावी समीकरणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
मतदाता सूची में मिलीं कई गड़बड़ियां
उच्च स्तरीय विश्लेषण में मतदाता सूची से जुड़ी कई अन्य अनियमितताएं भी सामने आई हैं। जांच के दौरान ऐसे मामलों की पहचान हुई है, जहां एक ही व्यक्ति या परिवार से जुड़े रिश्तों की जानकारी अलग-अलग राज्यों में रहने वाले लोगों से मैच कराई गई है।
इसके अलावा कुछ मामलों में एक ही व्यक्ति के नाम पर अलग-अलग EPIC नंबर (मतदाता पहचान संख्या) से एक से अधिक वोटर आईडी कार्ड भी पाए गए हैं।
डुप्लीकेट वोटर आईडी की होगी जांच
सूत्रों के मुताबिक, बड़ी संख्या में ऐसे मामलों की पहचान हुई है, जिनमें एक ही परिवार के सदस्यों के नाम विभिन्न जिलों में दर्ज हैं या एक ही व्यक्ति के कई वोटर आईडी कार्ड बनाए गए हैं। इन मामलों का आधिकारिक सत्यापन कराया जाएगा।
प्रशासन का उद्देश्य मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध और त्रुटिरहित बनाना है ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को दूर किया जा सके।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने क्या कहा?
उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने कहा कि चुनाव आयोग धर्म के आधार पर मतदाताओं का डेटा नहीं रखता है।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि डुप्लीकेट मतदाताओं की शिकायतें समय-समय पर मिलती रहती हैं। जांच पूरी होने के बाद ऐसे नामों को निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) के स्तर पर मतदाता सूची से हटाया जाता है।
रिश्तों की मैचिंग में गड़बड़ियों के सवाल पर उन्होंने कहा कि शिकायत मिलने पर सत्यापन कराया जा सकता है।
राज्य एजेंसियां और IB भी कर सकती हैं कार्रवाई
मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, कई बार खुफिया एजेंसियां (IB) भी चुनाव आयोग को रिपोर्ट भेजती हैं कि किसी विदेशी नागरिक ने गलत तरीके से मतदाता पहचान पत्र बनवा लिया है।
यदि जांच में धोखाधड़ी या फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मतदाता बनने के तथ्य सामने आते हैं, तो संबंधित एजेंसियां अपने स्तर पर भी कार्रवाई कर सकती हैं।
10 अप्रैल 2026 को जारी हुई थी अंतिम मतदाता सूची
विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण (SIR) के बाद उत्तर प्रदेश की विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों के लिए अंतिम मतदाता सूची 10 अप्रैल 2026 को जारी की गई थी। इसके बाद से ही विभिन्न राजनीतिक दल और विश्लेषक इन आंकड़ों का अध्ययन कर रहे हैं।
अब उच्च स्तर पर चल रहे डेटा विश्लेषण के आधार पर सत्यापन प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है, जिससे मतदाता सूची को और अधिक सटीक बनाया जा सके।

