9 साल बाद चीन गए ट्रंप खाली हाथ लौटे, 6 बैठकों के बाद भी किसी बड़ी डील का ऐलान नहीं

Praveen Yadav
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9 साल बाद चीन गए ट्रंप खाली हाथ लौटे, 6 बैठकों के बाद भी किसी बड़ी डील का ऐलान नहीं  बीजिंग/वॉशिंगटन। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति  का हालिया चीन दौरा अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक व्यापार जगत में काफी चर्चा का विषय बना रहा। लगभग 9 वर्षों बाद चीन पहुंचे ट्रंप से उम्मीद की जा रही थी कि अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से चल रहे व्यापारिक तनाव, टैरिफ विवाद, ताइवान और ईरान जैसे मुद्दों पर कोई बड़ी सहमति बनेगी। हालांकि, छह महत्वपूर्ण बैठकों और कई दौर की चर्चाओं के बावजूद कोई औपचारिक बड़ी डील या संयुक्त घोषणा सामने नहीं आई।  विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण जरूर रहा, लेकिन व्यावहारिक परिणामों के लिहाज से अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका।  जिनपिंग से मुलाकात के बाद भी नहीं बनी ठोस सहमति  चीन के राष्ट्रपति  और ट्रंप के बीच बीजिंग में कई अहम मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने वैश्विक स्थिरता, व्यापार, निवेश और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर विचार-विमर्श किया।  सूत्रों के अनुसार, बातचीत के दौरान अमेरिका ने चीन से व्यापार असंतुलन कम करने, अमेरिकी कंपनियों को अधिक बाजार पहुंच देने और बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग उठाई। वहीं चीन ने अमेरिका से टैरिफ प्रतिबंधों में ढील और तकनीकी निर्यात पर लगी सीमाओं को हटाने की अपेक्षा जताई।  हालांकि दोनों पक्षों ने बातचीत को सकारात्मक बताया, लेकिन किसी ठोस समझौते की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई।  टैरिफ और ट्रेड वॉर पर बनी रही अनिश्चितता  अमेरिका और चीन के बीच वर्षों से चल रहे ट्रेड वॉर को खत्म करने को लेकर इस दौरे से काफी उम्मीदें थीं। माना जा रहा था कि दोनों देश आयात शुल्क में कटौती और व्यापारिक प्रतिबंधों में राहत का रास्ता निकाल सकते हैं।  लेकिन बैठक के बाद ट्रंप ने केवल इतना कहा कि “बातचीत सही दिशा में है”, जबकि चीन की ओर से भी बेहद संतुलित और सामान्य प्रतिक्रिया दी गई। इससे यह स्पष्ट हो गया कि दोनों देशों के बीच मतभेद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।  विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीक, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रक्षा से जुड़े मामलों में दोनों देशों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है, जिसके कारण किसी व्यापक समझौते तक पहुंचना आसान नहीं है।  ईरान, ताइवान और वैश्विक तनाव पर भी हुई चर्चा  बैठक में ईरान संकट, ताइवान मुद्दा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय भी प्रमुखता से उठाए गए। ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मध्य-पूर्व की स्थिति को लेकर चिंता जताई।  वहीं चीन ने ताइवान मामले में अपने रुख को दोहराते हुए अमेरिका से क्षेत्रीय मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने की अपेक्षा की। दोनों देशों के बीच इन मुद्दों पर स्पष्ट मतभेद दिखाई दिए।  राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इन संवेदनशील विषयों पर सहमति नहीं बनने के कारण भी किसी बड़े समझौते की संभावना कमजोर पड़ गई।  निवेश और विमान खरीद को लेकर दावे  ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि चीन अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अरबों डॉलर का निवेश करने और बड़ी संख्या में बोइंग विमानों की खरीद के लिए तैयार है। हालांकि चीन की ओर से इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई।  इस बयान के बाद वैश्विक बाजारों में हलचल जरूर देखी गई, लेकिन निवेशकों ने इसे लेकर सतर्क रुख अपनाया क्योंकि किसी औपचारिक समझौते या दस्तावेज की जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई।  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिला मिश्रित प्रतिक्रिया  ट्रंप के चीन दौरे को लेकर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और मीडिया संस्थानों की प्रतिक्रिया मिश्रित रही। कुछ विश्लेषकों ने इसे संवाद बहाली की दिशा में सकारात्मक कदम बताया, जबकि कई लोगों ने इसे केवल राजनीतिक और कूटनीतिक प्रदर्शन करार दिया।  अमेरिका में विपक्षी नेताओं ने भी सवाल उठाए कि यदि छह दौर की बैठकों के बाद कोई ठोस परिणाम नहीं निकला, तो दौरे का वास्तविक उद्देश्य क्या था।  वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर  अमेरिका और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। ऐसे में दोनों देशों के रिश्तों में नरमी या तनाव का असर सीधे वैश्विक बाजार, निवेश, व्यापार और तेल की कीमतों पर पड़ता है।  विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में दोनों देशों के बीच कोई ठोस समझौता नहीं हुआ, तो वैश्विक व्यापारिक अनिश्चितता और बढ़ सकती है।  निष्कर्ष  करीब 9 साल बाद हुआ ट्रंप का चीन दौरा कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जरूर रहा, लेकिन इससे किसी बड़े व्यापारिक या राजनीतिक समझौते का रास्ता साफ होता नजर नहीं आया। छह महत्वपूर्ण बैठकों और कई दावों के बावजूद दुनिया को जिस बड़ी डील की उम्मीद थी, वह फिलहाल अधूरी ही दिखाई दे रही है।  अब आने वाले समय में दोनों देशों के बीच आगे की वार्ताएं और वैश्विक परिस्थितियां तय करेंगी कि अमेरिका और चीन अपने रिश्तों को सहयोग की दिशा में ले जाते हैं या प्रतिस्पर्धा और तनाव का दौर जारी रहेगा।


बीजिंग/वॉशिंगटन। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति का हालिया चीन दौरा अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक व्यापार जगत में काफी चर्चा का विषय बना रहा। लगभग 9 वर्षों बाद चीन पहुंचे ट्रंप से उम्मीद की जा रही थी कि अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से चल रहे व्यापारिक तनाव, टैरिफ विवाद, ताइवान और ईरान जैसे मुद्दों पर कोई बड़ी सहमति बनेगी। हालांकि, छह महत्वपूर्ण बैठकों और कई दौर की चर्चाओं के बावजूद कोई औपचारिक बड़ी डील या संयुक्त घोषणा सामने नहीं आई।


विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण जरूर रहा, लेकिन व्यावहारिक परिणामों के लिहाज से अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका।


जिनपिंग से मुलाकात के बाद भी नहीं बनी ठोस सहमति

चीन के राष्ट्रपति और ट्रंप के बीच बीजिंग में कई अहम मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने वैश्विक स्थिरता, व्यापार, निवेश और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर विचार-विमर्श किया।


सूत्रों के अनुसार, बातचीत के दौरान अमेरिका ने चीन से व्यापार असंतुलन कम करने, अमेरिकी कंपनियों को अधिक बाजार पहुंच देने और बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग उठाई। वहीं चीन ने अमेरिका से टैरिफ प्रतिबंधों में ढील और तकनीकी निर्यात पर लगी सीमाओं को हटाने की अपेक्षा जताई।


हालांकि दोनों पक्षों ने बातचीत को सकारात्मक बताया, लेकिन किसी ठोस समझौते की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई।


टैरिफ और ट्रेड वॉर पर बनी रही अनिश्चितता

अमेरिका और चीन के बीच वर्षों से चल रहे ट्रेड वॉर को खत्म करने को लेकर इस दौरे से काफी उम्मीदें थीं। माना जा रहा था कि दोनों देश आयात शुल्क में कटौती और व्यापारिक प्रतिबंधों में राहत का रास्ता निकाल सकते हैं।


लेकिन बैठक के बाद ट्रंप ने केवल इतना कहा कि “बातचीत सही दिशा में है”, जबकि चीन की ओर से भी बेहद संतुलित और सामान्य प्रतिक्रिया दी गई। इससे यह स्पष्ट हो गया कि दोनों देशों के बीच मतभेद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।


विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीक, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रक्षा से जुड़े मामलों में दोनों देशों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है, जिसके कारण किसी व्यापक समझौते तक पहुंचना आसान नहीं है।


ईरान, ताइवान और वैश्विक तनाव पर भी हुई चर्चा

बैठक में ईरान संकट, ताइवान मुद्दा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय भी प्रमुखता से उठाए गए। ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मध्य-पूर्व की स्थिति को लेकर चिंता जताई।


वहीं चीन ने ताइवान मामले में अपने रुख को दोहराते हुए अमेरिका से क्षेत्रीय मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने की अपेक्षा की। दोनों देशों के बीच इन मुद्दों पर स्पष्ट मतभेद दिखाई दिए।


राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इन संवेदनशील विषयों पर सहमति नहीं बनने के कारण भी किसी बड़े समझौते की संभावना कमजोर पड़ गई।


निवेश और विमान खरीद को लेकर दावे

ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि चीन अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अरबों डॉलर का निवेश करने और बड़ी संख्या में बोइंग विमानों की खरीद के लिए तैयार है। हालांकि चीन की ओर से इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई।


इस बयान के बाद वैश्विक बाजारों में हलचल जरूर देखी गई, लेकिन निवेशकों ने इसे लेकर सतर्क रुख अपनाया क्योंकि किसी औपचारिक समझौते या दस्तावेज की जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई।


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिला मिश्रित प्रतिक्रिया

ट्रंप के चीन दौरे को लेकर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और मीडिया संस्थानों की प्रतिक्रिया मिश्रित रही। कुछ विश्लेषकों ने इसे संवाद बहाली की दिशा में सकारात्मक कदम बताया, जबकि कई लोगों ने इसे केवल राजनीतिक और कूटनीतिक प्रदर्शन करार दिया।


अमेरिका में विपक्षी नेताओं ने भी सवाल उठाए कि यदि छह दौर की बैठकों के बाद कोई ठोस परिणाम नहीं निकला, तो दौरे का वास्तविक उद्देश्य क्या था।


वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर

अमेरिका और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। ऐसे में दोनों देशों के रिश्तों में नरमी या तनाव का असर सीधे वैश्विक बाजार, निवेश, व्यापार और तेल की कीमतों पर पड़ता है।


विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में दोनों देशों के बीच कोई ठोस समझौता नहीं हुआ, तो वैश्विक व्यापारिक अनिश्चितता और बढ़ सकती है।


निष्कर्ष

करीब 9 साल बाद हुआ ट्रंप का चीन दौरा कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जरूर रहा, लेकिन इससे किसी बड़े व्यापारिक या राजनीतिक समझौते का रास्ता साफ होता नजर नहीं आया। छह महत्वपूर्ण बैठकों और कई दावों के बावजूद दुनिया को जिस बड़ी डील की उम्मीद थी, वह फिलहाल अधूरी ही दिखाई दे रही है।


अब आने वाले समय में दोनों देशों के बीच आगे की वार्ताएं और वैश्विक परिस्थितियां तय करेंगी कि अमेरिका और चीन अपने रिश्तों को सहयोग की दिशा में ले जाते हैं या प्रतिस्पर्धा और तनाव का दौर जारी रहेगा।

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