Adani Coal Block Project: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, सिंगरौली कोयला परियोजना की वन मंजूरी में दखल देने से इनकार

Praveen Yadav
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पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे की याचिका खारिज; कोर्ट ने कहा- याचिका दायर करने में हुई अत्यधिक देरी; वकील का दावा— 6 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई और पर्यावरण को भारी नुकसान का खतरा।

पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे की याचिका खारिज; कोर्ट ने कहा- याचिका दायर करने में हुई अत्यधिक देरी; वकील का दावा— 6 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई और पर्यावरण को भारी नुकसान का खतरा।


देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में अडानी समूह (Adani Group) की सहायक कंपनी 'महान एनर्जीन लिमिटेड' (Mahan Energen Limited) की हाई-प्रोफाइल कोयला ब्लॉक परियोजना को दी गई वन और पर्यावरण मंजूरी (Forest & Environmental Clearances) में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया है।


गुरुवार, 21 मई 2026 को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम Court ने मुख्य रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देने में याचिकाकर्ता की ओर से अत्यधिक तकनीकी देरी की गई है। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अन्य कानूनी रास्ते (जैसे रिट याचिका) अपनाने की छूट देते हुए अपील वापस लेने की अनुमति दे दी है।


क्या है पूरा मामला और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी?

प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के 22 अप्रैल 2026 के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें एनजीटी ने समय-सीमा (Limitation Ground) का हवाला देते हुए अडानी समूह को मई 2025 में मिली पर्यावरण मंजूरी के खिलाफ उनकी याचिका खारिज कर दी थी।


📊 अत्यधिक देरी पर सवाल:

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता से पूछा, “याचिका दायर करने में इतनी देरी क्यों की गई? आपके द्वारा मूल आवेदन एनजीटी के समक्ष काफी देर से (22 जनवरी को) दायर किया गया था।”


📌 एनजीटी एक्ट की धारा 16:

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) एक्ट की धारा 16 के तहत किसी भी सरकारी प्राधिकरण के आदेश को 30 दिनों के भीतर चुनौती दी जानी अनिवार्य है। पर्याप्त कारण होने पर इसे अगले 60 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है, लेकिन इस मामले में तय अवधि बीत चुकी थी।


🔴 रिट याचिका का विकल्प:

याचिकाकर्ता के वकील सिद्धार्थ गुप्ता ने दलील दी कि पर्यावरण के इतने गंभीर मामले में कोर्ट को अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करना चाहिए और तकनीकी कमियों को आड़े नहीं आने देना चाहिए। हालांकि, कोर्ट द्वारा रिट याचिका (Writ Petition) के जरिए इस मामले को उठाने का सुझाव देने के बाद याचिकाकर्ता ने अपनी अपील वापस ले ली।


6 लाख पेड़ों की कटाई और वन्यजीवों पर संकट का दावा

याचिकाकर्ता के वकील सिद्धार्थ गुप्ता ने कोर्ट के समक्ष सिंगरौली क्षेत्र की इस परियोजना से होने वाले भारी पर्यावरणीय नुकसान के कुछ बेहद चौंकाने वाले तथ्य रखे:


🌳 6,00,000 से अधिक पेड़ों की कटाई:

इस कोयला ब्लॉक परियोजना के कारण सिंगरौली के घने, सदाबहार और आरक्षित वनों में मौजूद लगभग 6 लाख से अधिक बहुमूल्य पेड़ों को काटा जाना तय है।


🐘 हाथी गलियारा (Elephant Corridor):

यह पूरा क्षेत्र साल, सागौन और चार जैसे घने जंगलों से घिरा हुआ है। साल 2011 में सरकार ने इसे 'नो-गो ज़ोन' (No-Go Zone) घोषित किया था, जहां किसी भी प्रकार के खनन की अनुमति नहीं थी। यह क्षेत्र तेंदुओं, भालू, नीलगाय और हाथियों का प्राकृतिक गलियारा है।


🛑 अधिकारियों की शुरुआती असहमति:

वकीलों ने कोर्ट को बताया कि मध्य प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) ने शुरुआत में इस घने वन क्षेत्र में वन्यजीवों के नुकसान को देखते हुए स्टेज-I वन मंजूरी देने से मना कर दिया था, लेकिन बाद में एक अन्य समीक्षा समिति ने इस कोयला ब्लॉक को हरी झंडी दे दी।


प्रशासनिक और जन विरोध का इतिहास

यह परियोजना 1,397.54 हेक्टेयर के विशाल आरक्षित और संरक्षित वन क्षेत्र पर फैली हुई है।


📊 दिसंबर 2025 का जनआक्रोश:

याचिकाकर्ता के अनुसार, इस परियोजना का असली खुलासा तब हुआ जब दिसंबर 2025 के पहले सप्ताह में मीडिया रिपोर्टों के जरिए बड़े पैमाने पर (70,000 से अधिक पेड़ों की) वनों की कटाई की खबरें सामने आईं। इसके बाद स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरणविदों ने बड़े पैमाने पर सामूहिक विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए थे।


📌 आगे की कानूनी राह:

सुप्रीम कोर्ट से इस याचिका को वापस लेने के बाद अब पर्यावरणविद इस मामले को नए सिरे से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका (Writ Petition) के माध्यम से चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि सघन वनों को पूरी तरह नष्ट होने से बचाया जा सके।

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