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कैटगरी (Niche): नेशनल न्यूज़ / कानूनी सुधार / राज्य नीति विश्लेषण
अपडेट तिथि: 25 मई 2026 | मुद्धा: असम समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक
उत्तराखंड के बाद अब उत्तर-पूर्व का एक और प्रमुख राज्य समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) लागू करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठा चुका है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान आधिकारिक तौर पर 'असम समान नागरिक संहिता विधेयक 2026' पेश कर दिया है। इस बिल के सदन पटल पर आते ही राज्य और देश की राजनीति में चर्चाएं तेज हो गई हैं।
असम का यह यूसीसी बिल कई मायनों में बेहद सख्त और व्यापक है। इस कानून के लागू होने के बाद राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, संपत्ति के अधिकार और उत्तराधिकार के नियम एक समान हो जाएंगे, चाहे वे किसी भी धर्म या संप्रदाय से ताल्लुक रखते हों। इस विधेयक में बहुविवाह (Polygamy) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने और लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relations) के लिए कड़े नियम बनाने जैसे कई क्रांतिकारी और विवादित प्रस्ताव शामिल हैं। आइए इस बिल की प्रमुख बातों और प्रावधानों को गहराई से समझते हैं।
विधेयक के 3 सबसे बड़े और महत्वपूर्ण प्रावधान
असम सरकार द्वारा तैयार किए गए इस कानून के ड्राफ्ट में महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा और सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने के नाम पर कुछ बेहद कड़े कदम उठाए गए हैं, जो मुख्य रूप से इस प्रकार हैं:
- बहुविवाह (Polygamy) पर पूरी तरह रोक: इस कानून के अमल में आते ही असम में कोई भी नागरिक पहली पत्नी या पति के जीवित रहते दूसरा विवाह नहीं कर सकेगा। यह नियम सभी धर्मों के लोगों पर समान रूप से लागू होगा और इसका उल्लंघन करने पर भारी जुर्माने के साथ-साथ जेल की सजा का भी प्रावधान है।
- लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य: उत्तराखंड यूसीसी की तर्ज पर असम में भी अब लिव-इन में रहने वाले जोड़ों के लिए स्थानीय प्राधिकारी (रजिस्ट्रार) के पास अपना पंजीकरण कराना अनिवार्य कर दिया गया है। यदि कोई जोड़ा बिना रजिस्ट्रेशन के लिव-इन में रहता हुआ पाया जाता है या गलत जानकारी देता है, तो उसे कानूनी कार्रवाई का सामना करना होगा।
- शादी और तलाक का सरकारी रजिस्ट्रेशन: अब किसी भी धर्म के रीति-रिवाज से होने वाली शादी या तलाक को कानूनी रूप से मान्य होने के लिए सरकारी पोर्टल पर पंजीकृत कराना जरूरी होगा। इसके अलावा, हलाला और इद्दत जैसी प्रथाओं पर भी अप्रत्यक्ष रूप से रोक लगाने के प्रावधान किए गए हैं।
आदिवासी समुदायों को मिली बड़ी राहत, दायरे से रखा बाहर
असम एक बहु-सांस्कृतिक और भारी जनजातीय आबादी वाला राज्य है। स्थानीय परंपराओं और जल, जंगल, जमीन से जुड़े अधिकारों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने एक बहुत बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। इस विधेयक के दायरे से असम की सभी **अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes - ST)** को पूरी तरह बाहर रखा गया है।
सदन में विधेयक पेश करते हुए स्पष्ट किया गया कि भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों और आदिवासी समुदायों की पारंपरिक प्रथाओं, रूढ़ियों व रीति-रिवाजों में यह कानून किसी भी प्रकार का दखल नहीं देगा। भारत की लोकतांत्रिक और जनजातीय व्यवस्थाओं के बारे में व्यापक जानकारी के लिए आप संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक मानवाधिकार संस्था United Nations की वेबसाइट पर जा सकते हैं।
एक नजर में: असम यूसीसी (UCC) बिल की प्रमुख बातें
इस ऐतिहासिक विधेयक के मुख्य स्तंभों को नीचे दी गई तालिका के माध्यम से संक्षेप में समझा जा सकता है:
| विषय (Topic) | पुराना नियम/स्थिति | यूसीसी के बाद नया प्रस्तावित नियम |
|---|---|---|
| विवाह की संख्या | कुछ पर्सनल लॉ के तहत एक से अधिक शादियों की अनुमति थी। | **बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध**; एक समय पर केवल एक ही विवाह मान्य। |
| लिव-इन रिलेशनशिप | कोई सरकारी रिकॉर्ड या अनिवार्य नियम नहीं था। | **पंजीकरण (Registration) अनिवार्य**; उल्लंघन करने पर सजा और जुर्माना। |
| विवाह की कानूनी उम्र | अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ के हिसाब से उम्र तय थी। | सभी धर्मों के लिए लड़कियों की उम्र 18 वर्ष और लड़कों की 21 वर्ष अनिवार्य। |
| उत्तराधिकार/संपत्ति | बेटियों और बेटों के अधिकारों में धार्मिक नियमों के कारण असमानता थी। | पैतृक संपत्ति में बेटों और बेटियों को **बराबर का हक**। |
| जनजातीय छूट | सभी सामान्य कानूनों के तहत नियम लागू होते थे। | छठी अनुसूची के तहत **आदिवासियों को पूरी तरह छूट**। |
विपक्ष का रुख और आगे की कानूनी राह
असम विधानसभा में इस विधेयक के पेश होते ही विपक्ष (विशेषकर कांग्रेस और एआईयूडीएफ) ने इसका पुरजोर विरोध करना शुरू कर दिया है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि सरकार इस कानून के जरिए ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है और अल्पसंख्यकों के पर्सनल लॉ अधिकारों पर सीधा हमला बोल रही है।
हालांकि, विधानसभा में सत्ताधारी दल के पास स्पष्ट बहुमत होने के कारण इस बिल के आसानी से पारित होने की उम्मीद है। पारित होने के बाद इसे अंतिम मंजूरी के लिए राज्यपाल और फिर राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। भारत के नागरिक अधिकारों और पारिवारिक कानूनों की वैश्विक तुलना देखने के लिए आप विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO की सामाजिक विकास रिपोर्ट्स की मदद ले सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs) - असम समान नागरिक संहिता
1. असम यूसीसी बिल में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर क्या नियम बनाया गया है?
असम यूसीसी बिल के अनुसार, राज्य में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले सभी जोड़ों को स्थानीय रजिस्ट्रार के पास अपनी जानकारी देकर पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। बिना रजिस्ट्रेशन के साथ रहने पर कानूनी रूप से अवैध माना जाएगा और सजा का प्रावधान होगा।
2. क्या बहुविवाह पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है?
जी हां, इस विधेयक में साफ किया गया है कि असम का कोई भी नागरिक (चाहे वह किसी भी धर्म का हो) अपनी पहली शादी के रहते हुए दूसरा विवाह नहीं कर सकता। बहुविवाह को पूरी तरह से गैर-कानूनी घोषित करने का प्रस्ताव है।
3. क्या असम के आदिवासियों पर भी यूसीसी (UCC) नियम लागू होंगे?
नहीं, असम सरकार ने राज्य के सभी अनुसूचित जनजातियों (ST) और संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत आने वाले आदिवासी क्षेत्रों को इस कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा है। उनकी पारंपरिक प्रथाएं पहले की तरह चलती रहेंगी।
4. समान नागरिक संहिता लागू करने वाला असम देश का कौन सा राज्य है?
उत्तराखंड के बाद असम देश का दूसरा ऐसा राज्य बनने की राह पर है जो विधानसभा के जरिए बकायदा कानून बनाकर समान नागरिक संहिता (UCC) को अपने राज्य में लागू करने जा रहा है। (गोवा में पुर्तगाली काल से ही यूसीसी लागू है)।
5. इस कानून के लागू होने के बाद विवाह और तलाक की क्या प्रक्रिया होगी?
विवाह भले ही किसी भी धार्मिक रीति-रिवाज (निकाह, फेरे या चर्च मैरिज) से हो, लेकिन उसका सरकारी पोर्टल पर पंजीकरण कराना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। इसी तरह, तलाक के लिए भी केवल अदालत या तय कानूनी रास्ता ही मान्य होगा, कोई भी पर्सनल लॉ बोर्ड एकतरफा फैसला नहीं दे सकेगा।
निष्कर्ष (Conclusion)
असम सरकार द्वारा विधानसभा में समान नागरिक संहिता बिल पेश किया जाना देश की कानूनी व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव है। जहां समर्थक इसे महिलाओं के अधिकारों की रक्षा, बाल विवाह के खात्मे और आधुनिक समाज के निर्माण के लिए एक साहसिक कदम बता रहे हैं, वहीं आलोचक इसे व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप मान रहे हैं। असम जैसे संवेदनशील और विविधताओं से भरे राज्य में इस कानून का जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन कैसे होता है, यह आने वाले समय में देश के अन्य राज्यों के लिए एक बड़ा उदाहरण बनेगा।

