Types of Eid in Islam: इस्लाम में सिर्फ मीठी ईद और बकरीद ही नहीं, बल्कि मुख्य रूप से 3 तरह की ईद मनाई जाती हैं। जानिए ईद-उल-फितर, ईद-उल-अजहा और ईद-मिलाद-उन-नबी का महत्व।
नई दिल्ली: भारत समेत पूरी दुनिया में इस समय इस्लाम धर्म के दूसरे सबसे बड़े त्योहार 'ईद-उल-अजहा' यानी बकरीद की तैयारियां जोरों पर हैं। इस्लामी चंद्र कैलेंडर के मुताबिक, हर साल यह त्योहार बेहद अकीदत और उत्साह के साथ मनाया जाता है। आम तौर पर बहुत से लोग सिर्फ दो ही ईदों के बारे में जानते हैं—पहली 'मीठी ईद' (ईद-उल-फितर) और दूसरी 'बकरीद' (ईद-उल-अजहा)।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस्लाम में मुख्य रूप से तीन तरह की ईद मनाई जाती हैं? अरबी भाषा में 'ईद' शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है 'उत्सव', 'खुशी का दिन' या 'ऐसा त्योहार जो बार-बार आए'। इस्लाम धर्म में इन तीनों ईदों का अपना अलग धार्मिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व है। आइए जानते हैं साल भर में मनाई जाने वाली इन तीनों ईदों के बारे में विस्तार से।
1. ईद-उल-फितर (Eid-ul-Fitr) - जिसे कहते हैं मीठी ईद
ईद-उल-फितर को आम बोलचाल की भाषा में 'मीठी ईद' या 'रमजान की ईद' कहा जाता है। यह त्योहार इस्लामिक कैलेंडर के 10वें महीने यानी 'शव्वाल' के पहले दिन मनाया जाता है। इससे ठीक पहले मुसलमान पवित्र 'रमजान' महीने में पूरे 30 दिनों तक कड़े रोजे (व्रत) रखते हैं, अल्लाह की इबादत करते हैं और कुप्रवृत्तियों से दूर रहने का संकल्प लेते हैं।
जब रमजान के आखिरी दिन शव्वाल महीने का चांद दिखाई देता है, तो अगले दिन ईद-उल-फितर मनाई जाती है। 'फितर' का मतलब होता है रोजा खोलना या उपवास समाप्त करना। इस दिन सुबह मस्जिदों और ईदगाहों में विशेष नमाज अदा की जाती है। घरों में शीर-खुरमा और सेंवई जैसी मीठी चीजें बनाई जाती हैं, गले मिलकर भाईचारे का संदेश दिया जाता है। इस ईद पर 'जकात' और 'फितरा' (दान) देना हर सक्षम मुसलमान के लिए अनिवार्य होता है ताकि गरीब भी खुशियों में शामिल हो सकें।
2. ईद-उल-अजहा (Eid-ul-Adha) - त्याग और बलिदान की बकरीद
ईद-उल-अजहा को 'बकरीद' या 'ईद-उज़-जुहा' भी कहा जाता है। यह इस्लाम का दूसरा सबसे बड़ा और पवित्र त्योहार है, जो इस्लामिक कैलेंडर के आखिरी (12वें) महीने 'जिलहिज' (Dhu al-Hijjah) के 10वें दिन मनाया जाता है। यह त्योहार मुख्य रूप से त्याग, समर्पण और अल्लाह के प्रति अटूट विश्वास का प्रतीक है।
यह दिन पैगंबर हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम के उस महान बलिदान की याद में मनाया जाता है, जब वे अल्लाह के हुक्म पर अपने अजीज बेटे हजरत इस्माइल की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए थे। उनकी इस वफादारी और जज्बे से खुश होकर अल्लाह ने उनके बेटे की जगह एक दुंबे (भेड़/बकरे) को प्रतिस्थापित कर दिया था।
तभी से इस दिन प्रतीकात्मक रूप से हलाल जानवर की कुर्बानी (Qurbani) देने की परंपरा है। इस मांस को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है—एक हिस्सा खुद के लिए, दूसरा रिश्तेदारों-दोस्तों के लिए, और तीसरा हिस्सा अनिवार्य रूप से गरीबों और जरूरतमंदों में वितरित किया जाता है। इसी महीने में मक्का की पवित्र हज यात्रा भी संपन्न होती है।
| ईद का नाम | कब मनाई जाती है? (हिजरी महीना) | मुख्य संदेश और प्रतीक |
|---|---|---|
| ईद-उल-फितर (मीठी ईद) | शव्वाल महीने का पहला दिन | रमजान के रोजों की समाप्ति, भाईचारा, दान (जकात-उल-फितर) और मीठे पकवान। |
| ईद-उल-अजहा (बकरीद) | जिलहिज महीने का 10वां दिन | हजरत इब्राहिम का बलिदान, अल्लाह के प्रति समर्पण, जानवरों की कुर्बानी और मांस वितरण। |
| ईद-मिलाद-उन-नबी (बारावफात) | रबी-उल-अव्वल महीने का 12वां दिन | पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब का जन्मदिवस, उनकी शिक्षाओं और शांति का स्मरण। |
3. ईद-मिलाद-उन-नबी (Eid Milad-un-Nabi) - पैगंबर साहब का प्रकाश पर्व
इस्लाम में मनाई जाने वाली तीसरी प्रमुख ईद को 'ईद-मिलाद-उन-नबी' या 'ईद-ए-मिलाद' कहा जाता है। भारतीय उपमहाद्वीप में इसे 'बारावफात' के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन इस्लाम धर्म के आखिरी पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब (Peace Be Upon Him) के जन्म की खुशी में मनाया जाता है।
इस्लामिक कैलेंडर के तीसरे महीने 'रबी-उल-अव्वल' की 12वीं तारीख को पैगंबर साहब का जन्म मक्का शहर में हुआ था। इस दिन को मुस्लिम समुदाय के लोग बहुत ही सादगी और आध्यात्मिक उत्साह के साथ मनाते हैं। मस्जिदों, घरों और रास्तों को रोशनी से सजाया जाता है।
इस दिन जुलूस निकाले जाते हैं, धार्मिक जलसे होते हैं जिनमें पैगंबर साहब के जीवन, उनकी शिक्षाओं, उनके द्वारा दिए गए शांति, दया और इंसानियत के संदेशों को याद किया जाता है। लोग इस दिन कसरत से दरूद शरीफ पढ़ते हैं और गरीबों को खाना खिलाते हैं।
FAQ: इस्लाम में ईद के त्योहारों से जुड़े सवाल
इस्लाम धर्म में मुख्य रूप से कितनी ईद मनाई जाती हैं?
ईद-मिलाद-उन-नबी (बारावफात) क्यों मनाई जाती है?
निष्कर्ष (Conclusion)
इस्लाम में मनाई जाने वाली ये तीनों ईदें केवल व्यक्तिगत खुशी मनाने का साधन नहीं हैं, बल्कि ये समाज को एक सूत्र में पिरोने का काम करती हैं। जहाँ ईद-उल-फितर हमें आत्म-संयम और जरूरतमंदों की मदद (जकात) करना सिखाती है, वहीं ईद-उल-अजहा हमें ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और अपने हिस्से की खुशियों को समाज के सबसे कमजोर वर्ग के साथ साझा करना सिखाती है।
इसी तरह ईद-मिलाद-उन-नबी हमें पैगंबर साहब के बताए दया, करुणा और शांति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। संक्षेप में कहें तो, ये सभी त्योहार आपसी प्रेम, इंसानियत और सामाजिक समरसता के सबसे बड़े प्रतीक हैं।

