दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत माने जाने वाले अमेरिका के सामने इस समय सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा है कि क्या वह एक और लंबे युद्ध का बोझ उठा सकता है?
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump लगातार सार्वजनिक मंचों से ईरान पर सख्त बयान दे रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ पर्दे के पीछे समझौते की कोशिशें भी तेजी से चल रही हैं। हाल के दिनों में सामने आई रिपोर्ट्स और कूटनीतिक गतिविधियों ने यह साफ संकेत दिया है कि वॉशिंगटन अब खुली जंग से ज्यादा “कंट्रोल्ड डील” की तरफ बढ़ना चाहता है।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव पिछले कई महीनों से लगातार बढ़ता रहा है। परमाणु कार्यक्रम, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़, तेल आपूर्ति और पश्चिम एशिया में प्रभाव की लड़ाई ने दोनों देशों को टकराव के बेहद करीब ला दिया। लेकिन अब हालात ऐसे मोड़ पर पहुंच चुके हैं जहां अमेरिका के भीतर भी युद्ध को लेकर राजनीतिक और आर्थिक दबाव तेजी से बढ़ रहा है।
हालिया रिपोर्टों के मुताबिक ट्रंप प्रशासन सार्वजनिक रूप से कठोर रुख दिखाने के बावजूद बैकचैनल बातचीत को खुला रखे हुए है। कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि पाकिस्तान, ओमान और कुछ अन्य मध्यस्थ देशों के जरिए अमेरिका और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता जारी है।
ट्रंप लगातार यह कहते रहे हैं कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे। हाल ही में उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ईरान के समृद्ध यूरेनियम को “नष्ट” भी कर सकता है। लेकिन दूसरी तरफ वही ट्रंप यह भी कह रहे हैं कि समझौते की “बहुत अच्छी संभावना” मौजूद है और युद्ध जल्द खत्म हो सकता है।
यही विरोधाभास इस समय पूरी दुनिया की नजर में है। सामने आक्रामक बयान, लेकिन अंदरखाने समझौते की कोशिश।
दरअसल अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ ईरान नहीं है, बल्कि युद्ध की आर्थिक कीमत भी है। रूस-यूक्रेन युद्ध पहले से वैश्विक बाजार को अस्थिर बनाए हुए है।
अगर पश्चिम एशिया में बड़ा संघर्ष बढ़ता है तो तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में तनाव के कारण वैश्विक सप्लाई पर गंभीर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है। दुनिया की बड़ी मात्रा में तेल सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है। ऐसे में अगर युद्ध और बढ़ता है तो इसका असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अमेरिका और यूरोप की अर्थव्यवस्था पर भी भारी दबाव पड़ेगा।
अमेरिका पहले ही महंगाई, बढ़ते कर्ज और घरेलू राजनीतिक ध्रुवीकरण से जूझ रहा है। अमेरिकी जनता भी लंबे युद्धों से थक चुकी है। इराक और अफगानिस्तान के अनुभव ने अमेरिकी राजनीति को बदल दिया है। अब अमेरिकी मतदाता विदेशी युद्धों पर अरबों डॉलर खर्च करने के खिलाफ पहले से ज्यादा मुखर हैं।
इसी वजह से ट्रंप प्रशासन के भीतर भी दो राय दिखाई दे रही है। एक धड़ा चाहता है कि ईरान पर दबाव बनाए रखा जाए, जबकि दूसरा मानता है कि सीमित समझौता ही अमेरिका के हित में होगा।
अमेरिकी कांग्रेस में भी युद्ध को लेकर मतभेद बढ़ रहे हैं। कई सांसद खुलकर सवाल उठा रहे हैं कि क्या अमेरिका को एक और बड़े विदेशी संघर्ष में उतरना चाहिए। यही कारण है कि युद्ध को लेकर राजनीतिक दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
युद्ध के खिलाफ यह बढ़ता राजनीतिक दबाव ट्रंप के लिए भी चुनौती बनता जा रहा है। क्योंकि एक तरफ उन्हें अपनी “मजबूत नेता” वाली छवि बनाए रखनी है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी अर्थव्यवस्था और चुनावी राजनीति को भी संभालना है।
इसी बीच ईरान भी लगातार अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है। तेहरान ने अमेरिकी प्रस्तावों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच कुछ मुद्दों पर दूरी कम होने की बात सामने आई है। हालांकि सबसे बड़ा विवाद अभी भी परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम भंडार को लेकर है।
ईरान चाहता है कि उस पर लगे प्रतिबंध हटाए जाएं और भविष्य में अमेरिकी हमले की गारंटी दी जाए। दूसरी तरफ अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन और मिसाइल कार्यक्रम पर बड़ी रियायतें दे। यही वजह है कि बातचीत आगे बढ़ने के बावजूद अंतिम समझौता अभी दूर दिखाई देता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप इस समय “दोहरी रणनीति” पर काम कर रहे हैं। एक तरफ सैन्य दबाव बनाए रखना, दूसरी तरफ बातचीत का रास्ता खुला रखना। इसका मकसद ईरान को मनोवैज्ञानिक दबाव में रखना भी है और घरेलू राजनीति में अपनी ताकतवर छवि दिखाना भी।
लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की स्थिति उतनी मजबूत नहीं है जितनी वह दिखाने की कोशिश कर रहा है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के कुछ आकलनों में यह माना गया है कि ईरान लंबे आर्थिक दबाव के बावजूद अपने सिस्टम को पूरी तरह टूटने नहीं देगा। यानी यह लड़ाई अमेरिका के लिए भी आसान नहीं होगी।
इसके अलावा चीन और रूस जैसे देश भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। अगर अमेरिका पश्चिम एशिया में और उलझता है तो इसका असर यूक्रेन युद्ध और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की रणनीति पर भी पड़ सकता है। कई भू-राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि वॉशिंगटन अब एक साथ कई मोर्चों पर खुली जंग का जोखिम नहीं लेना चाहता।
यही कारण है कि हाल के हफ्तों में अमेरिका की भाषा बदली हुई दिखाई दे रही है। पहले “नो डील” और “अनकंडीशनल सरेंडर” जैसे बयान दिए गए, लेकिन अब “वार खत्म होने वाली है” और “समझौते की संभावना” जैसे संकेत सामने आ रहे हैं।
हालांकि जमीन पर स्थिति अभी भी बेहद संवेदनशील बनी हुई है। युद्धविराम पूरी तरह स्थिर नहीं माना जा रहा। किसी भी छोटी घटना से तनाव फिर बढ़ सकता है।
इसी बीच ईरान भी अपनी सैन्य क्षमता को दोबारा मजबूत करने में लगा हुआ है। कई रिपोर्टों में कहा गया है कि तेहरान तेजी से ड्रोन और मिसाइल क्षमता को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
ऐसे में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि अमेरिका युद्ध झेल सकता है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या अमेरिका अब “अनंत युद्धों” की नीति को जारी रखना चाहता है?
ट्रंप के सामने चुनौती यह है कि अगर वह ज्यादा नरमी दिखाते हैं तो विरोधी उन्हें कमजोर बताएंगे। लेकिन अगर संघर्ष बढ़ता है और तेल संकट गहराता है तो अमेरिकी जनता सीधे असर महसूस करेगी।
इसलिए मौजूदा तस्वीर यही बताती है कि अमेरिका इस समय खुली जंग से ज्यादा “मैनेज्ड कॉन्फ्लिक्ट” चाहता है। ट्रंप मंच से भले ही सख्त बयान दे रहे हों, लेकिन कूटनीतिक चैनल बंद नहीं किए गए हैं। बल्कि हाल के घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि पर्दे के पीछे बातचीत की रफ्तार पहले से तेज हुई है।
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि क्या दोनों देश किसी अंतरिम समझौते तक पहुंचते हैं या फिर तनाव दोबारा बड़े सैन्य टकराव में बदलता है।
फिलहाल इतना साफ है कि अमेरिका अब हर कीमत पर लंबा युद्ध नहीं चाहता, क्योंकि इसकी आर्थिक, राजनीतिक और वैश्विक रणनीतिक कीमत बहुत भारी पड़ सकती है।

