🔴 JanDrishti Editorial: भारत-बांग्लादेश सीमा, विशेष रूप से तीनबीघा कॉरिडोर से सटे दहग्राम-अंगारपोटा क्षेत्र में तनाव की आग एक बार फिर भड़क उठी है। कंटीले तारों की बाड़ लगाने जैसे सुरक्षात्मक कदम को लेकर हुई हालिया तनातनी ने एक बार फिर सीमा प्रबंधन की जटिलताओं और राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकताओं को केंद्र में ला खड़ा किया है। प्रश्न केवल जमीन मापने का नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता और सुरक्षा व्यवस्था को मुस्तैद करने का है।
घटना का सार: सुरक्षा के खिलाफ 'अड़चनें'
घटना शुक्रवार की है, जब मेखलीगंज ब्लॉक के सीमावर्ती क्षेत्रों में लगभग 105 एकड़ जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई। यह तारबंदी का कार्य केवल एक निर्माण नहीं, बल्कि घुसपैठ, तस्करी और अवैध गतिविधियों पर नकेल कसने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। जैसे ही अधिकारियों ने जमीन की पैमाइश शुरू की, सीमा के उस पार से बीजीबी (बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश) और स्थानीय लोगों द्वारा आपत्ति जताना सुरक्षा तंत्र के लिए एक चिंता का विषय बन गया है।
सीमा पर बसे ग्रामीणों का जीवन पहले से ही अनिश्चितताओं के बीच बीतता है। स्थानीय निवासी विष्णुपद राय और जयनाथ राय की प्रतिक्रिया स्पष्ट है—भारतीय जमीन पर विकास और सुरक्षा के कार्यों में बार-बार बाधा डाला जाना निवासियों के धैर्य की परीक्षा ले रहा है। यह आक्रोश केवल विकास रुकने का नहीं है, बल्कि अपनी ही जमीन पर खुद को असुरक्षित महसूस करने का भी है।
इस तनावपूर्ण माहौल में बीएसएफ (BSF) की भूमिका सराहनीय रही है। जहाँ एक ओर उत्तेजना फैलने का पूरा खतरा था, वहीं बीएसएफ की 174वीं बटालियन के अधिकारियों ने संयम का परिचय देते हुए स्थिति को बिगड़ने से बचाया। घटना के बाद हुई फ्लैग मीटिंग, जिसमें बीएसएफ के कमांडिंग ऑफिसर विनोद सिंह और बीजीबी के अधिकारियों के बीच चर्चा हुई, यह दर्शाती है कि भारत हमेशा कूटनीतिक समाधानों को प्राथमिकता देता है, लेकिन सुरक्षा के प्रति समझौता करने के मूड में नहीं है।
'सुरक्षा से कोई समझौता नहीं'
विधायक दधिराम राय का सीमा क्षेत्र का दौरा और उसके बाद दिया गया बयान सरकार की बदलती प्राथमिकताओं को स्पष्ट करता है। उन्होंने 45 दिनों के भीतर कार्य पूरा करने का जो अल्टीमेटम दिया है, वह यह संदेश देता है कि अब सुरक्षा कार्यों में शिथिलता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह कड़ा रुख केवल स्थानीय राजनीति नहीं, बल्कि केंद्र की 'जीरो टॉलरेंस' नीति का प्रतिबिंब है।
सीमा पर तारबंदी का कार्य पूरा करना अब एक रणनीतिक आवश्यकता बन गया है। प्रशासनिक सूत्रों का मानना है कि आने वाले दिनों में सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक 'सक्रिय' (Proactive) बनाया जाएगा। यदि बांग्लादेश की ओर से अड़चनें बरकरार रहती हैं, तो भारत को कूटनीतिक दबाव के साथ-साथ जमीनी स्तर पर अपनी सुरक्षा को और अधिक कठोर करने की आवश्यकता होगी।
निष्कर्ष: तीनबीघा कॉरिडोर का यह विवाद एक अनुस्मारक है कि सीमा की सुरक्षा कोई एक बार की जाने वाली प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह निरंतर सतर्कता की मांग करती है। भारत ने संयम भी दिखाया है और संकल्प भी। अब गेंद दूसरे पाले में है कि क्या पड़ोसी देश सहयोग का हाथ बढ़ाता है या फिर सुरक्षा बाधाओं को लेकर तनाव को और गहरा होने देता है।

