🔴 JanDrishti Special Report: “पुलिस आपकी दोस्त है” — यह लाइन अक्सर सरकारी विज्ञापनों और थानों की दीवारों पर लिखी दिखाई देती है। लेकिन उत्तर प्रदेश के हजारों लोगों के लिए यह एक बड़ा सवाल बन चुका है कि आखिर पुलिस सच में जनता की रक्षक है या फिर सत्ता, राजनीतिक दबाव और भ्रष्टाचार के बोझ तले दबी एक ऐसी व्यवस्था, जो आम आदमी के लिए सबसे बड़ी परेशानी का सबब है?
साल 2017 के बाद उत्तर प्रदेश में अपनाए गए “सख्त पुलिसिंग” और “जीरो टॉलरेंस” के मॉडल ने राज्य की छवि बदली है, लेकिन इसी दौर में पुलिस की मनमानी, फर्जी मुठभेड़, हिरासत में मौत, रिश्वतखोरी और आम नागरिकों के उत्पीड़न के आरोप भी उतनी ही तेजी से बढ़े हैं।
1. वर्दी का अहंकार: बेलगाम होती पुलिस
हाल के वर्षों में, प्रदेश में पुलिस की छवि में भारी गिरावट आई है। वर्दी का रौब दिखाकर आम लोगों को प्रताड़ित करना, छोटी बातों पर थर्ड-डिग्री का इस्तेमाल करना और अदालती प्रक्रिया को दरकिनार कर खुद न्यायदाता बन बैठना पुलिस की कार्यशैली का हिस्सा बन गया है।
- हिरासत में मौत के बढ़ते मामले: पुलिस हिरासत में मौतों के आंकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि थानों के भीतर मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
- अमानवीय व्यवहार: पीड़ित जब अपनी फरियाद लेकर थाने पहुंचता है, तो उसे मदद मिलने के बजाय दुत्कार और गाली-गलौज का सामना करना पड़ता है, जिससे पुलिस और जनता के बीच की खाई और चौड़ी होती जा रही है।
2. भ्रष्टाचार की जड़ें: व्यवस्था का 'सुविधा शुल्क'
भ्रष्टाचार उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली की नींव बन चुका है। यह भ्रष्टाचार केवल नीचे स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संगठित ढांचा है।
- FIR का 'रेट कार्ड': कई जिलों में स्थिति यह है कि गंभीर से गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कराने के लिए भी 'सुविधा शुल्क' देना पड़ता है। यदि पीड़ित की आर्थिक स्थिति कमजोर है, तो पुलिस या तो केस दर्ज करने से इनकार कर देती है या उसे इतना उलझा देती है कि पीड़ित खुद ही न्याय की उम्मीद छोड़ देता है।
- जांच का निजीकरण: जांच अधिकारी (IO) अक्सर रसूखदार लोगों या मोटी रकम देने वाले पक्ष के हक में केस को मोड़ने में संकोच नहीं करते। विवेचना में हेरफेर करना, गवाहों को डराना और सबूतों को मिटाना एक आम प्रक्रिया बन चुकी है।
- सड़क से थाने तक वसूली: ट्रैफिक चेकिंग के नाम पर आम वाहन चालकों से जबरन वसूली और छोटे दुकानदारों व रेहड़ी-पटरी वालों को 'सुरक्षा शुल्क' के नाम पर डराना-धमकाना पुलिस की साख पर गहरा दाग है।
3. क्या हैं इसके पीछे के मुख्य कारण?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस गिरावट के पीछे कई गंभीर कारण हैं, जिन्हें अनदेखा करना मुश्किल है:
- जवाबदेही का अभाव (Lack of Accountability): पुलिस अधिकारियों में जनता के प्रति जवाबदेही की भारी कमी है। आंतरिक निगरानी तंत्र (Internal Vigilance) या तो निष्क्रिय है या भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने का काम करता है।
- राजनीतिक संरक्षण (Political Patronage): भ्रष्टाचार और अत्याचार करने वाले पुलिसकर्मियों को अक्सर सत्ताधारी दल या प्रभावशाली राजनेताओं का संरक्षण प्राप्त होता है। इससे उनका मनोबल सातवें आसमान पर रहता है।
- संवेदनहीनता का प्रशिक्षण: पुलिस ट्रेनिंग के दौरान मानवीय मूल्यों, सहानुभूति और मानवाधिकारों को प्राथमिकता कम मिलने के कारण व्यवहार में कठोरता और संवेदनहीनता घर कर गई है।
- काम का अत्यधिक दबाव और संसाधन की कमी: हालांकि यह भ्रष्टाचार का बहाना नहीं हो सकता, लेकिन पुलिस बल पर काम का भारी दबाव और संसाधनों की कमी भी कहीं न कहीं कर्मचारियों को अवैध तरीके से धन अर्जित करने के लिए प्रेरित करती है।
4. जनता का खोता भरोसा: एक खतरनाक स्थिति
जब समाज का रक्षक ही कानून को अपनी मुट्ठी में करने लगे, तो आम आदमी कहाँ जाए? पुलिस विभाग में व्याप्त इस भ्रष्टाचार और अत्याचार के कारण आम जनता में पुलिस के प्रति डर और असुरक्षा का भाव पैदा हो गया है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में पुलिस का काम शांति और सुरक्षा प्रदान करना है, लेकिन यहाँ पुलिस से ही सुरक्षा की जरूरत महसूस हो रही है। यह स्थिति सामाजिक अराजकता को बढ़ावा देती है।
5. सुधार की दिशा: सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए?
सरकार द्वारा अक्सर 'जीरो टॉलरेंस' का दावा किया जाता है, लेकिन धरातल पर स्थितियाँ बिल्कुल विपरीत हैं। व्यवस्था में सुधार के लिए निम्नलिखित कदम अपरिहार्य हैं:
- पुलिस सुधार (Police Reforms): दशकों से लंबित पुलिस सुधारों को अब लागू करने का समय आ गया है। पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा।
- डिजिटल जवाबदेही: थाने में होने वाली हर कार्रवाई, बयान और जांच को अनिवार्य रूप से सीसीटीवी कैमरों और डिजिटल मॉनिटरिंग के दायरे में लाना होगा।
- स्वतंत्र जांच एजेंसी: पुलिस की शिकायतों के लिए एक स्वतंत्र 'पुलिस शिकायत प्राधिकरण' (Police Complaints Authority) को प्रभावी बनाना होगा, जो बिना किसी दबाव के जांच कर सके।
- नियमित मानसिक स्वास्थ्य परीक्षण: पुलिस बल में बढ़ते मानसिक तनाव और कुंठा को कम करने के लिए नियमित काउंसलिंग की जानी चाहिए।
2017 के बाद बदली यूपी पुलिस की तस्वीर
साल 2017 में नई सरकार बनने के बाद यूपी पुलिस को “एक्शन मोड” में लाया गया। अपराधियों के खिलाफ बड़े स्तर पर अभियान चलाए गए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2017 के बाद से 10,000 से अधिक पुलिस मुठभेड़ हुई हैं और 200 से अधिक अपराधी मारे गए हैं। सरकार इसे “कानून व्यवस्था में सुधार” बताती है, वहीं मानवाधिकार संगठन और विपक्ष इसे “डर आधारित पुलिसिंग” कहते हैं। इस दौरान कई गंभीर आरोप सामने आए हैं:
- गरीब और कमजोर वर्ग का सबसे ज्यादा निशाने पर रहना।
- पुलिस हिरासत में मारपीट की घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि।
- कई एनकाउंटरों की निष्पक्ष जांच का अभाव।
- FIR दर्ज करने में पुलिस की मनमानी और राजनीतिक दबाव में कार्रवाई।
NCRB और NHRC के आंकड़े: पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के आंकड़े व्यवस्था की पोल खोलते हैं:
- हिरासत में मौत: NCRB के अनुसार 2017 में देशभर में 100 हिरासत मौतें दर्ज हुईं, जिनमें दोषसिद्धि (Conviction) लगभग शून्य रही।
- यूपी की स्थिति: NHRC के आंकड़ों के मुताबिक 2017-18 के दौरान उत्तर प्रदेश हिरासत मौतों के मामले में देश में सबसे ऊपर रहा।
- जांच का संकट: विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकतर मामलों में निष्पक्ष जांच नहीं हो पाती क्योंकि पुलिस खुद ही जांच एजेंसी बन जाती है।
महिला अपराध: 2017 से 2022 का डेटा
सरकारी आंकड़ों और NCRB रिपोर्ट्स के अनुसार, महिला सुरक्षा के मोर्चे पर स्थिति गंभीर है:
- 2017 में: महिला अपराधों के लगभग 56,000 मामले दर्ज थे।
- 2022 में: यह आंकड़ा बढ़कर 65,000+ के पार पहुंच गया।
- वृद्धि: इन वर्षों में लगभग 15 से 18 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है।
- प्रमुख अपराध: रेप, घरेलू हिंसा, छेड़छाड़ और दहेज हत्या।
विवादित केस स्टडीज: जब रक्षक पर ही उठे सवाल
- सचेड़ी (कानपुर) रेप केस: पुलिसकर्मी की मिलीभगत और FIR दर्ज करने में देरी का आरोप।
- उन्नाव रेप केस: सत्ताधारी दल के विधायक को बचाने और पीड़िता को धमकाने का राष्ट्रीय विवाद।
- हाथरस केस: पीड़िता का रात में अंतिम संस्कार और पुलिस द्वारा सबूतों को दबाने के विवादित आरोप।
भ्रष्टाचार और सिस्टम की विफलता
यूपी के थानों में FIR के लिए रिश्वत, जमीन विवाद में पक्षपात और “रेट सिस्टम” की शिकायतें आम हैं। हालांकि, सरकार का कहना है कि उन्होंने माफिया पर कार्रवाई की है और दंगे खत्म किए हैं, लेकिन आम आदमी की मांग है कि पुलिस निष्पक्ष हो, अमीर-गरीब के लिए अलग कानून न हो और थाने में दलाली बंद हो।
JanDrishti Analysis
उत्तर प्रदेश में पुलिसिंग एक “दोहरी तलवार” बन चुकी है। अपराध पर सख्ती जरूरी है, लेकिन लोकतंत्र में कोई भी कानून से ऊपर नहीं हो सकता। पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त करना, स्वतंत्र जांच एजेंसियों का गठन और पारदर्शिता लाना ही रक्षक और भक्षक के बीच की इस बहस को समाप्त कर सकता है।

