प्रस्तावना: भारत में उपभोक्ता संरक्षण की अवधारणा को 'जागो ग्राहक जागो' जैसे नारों से बल मिला, लेकिन आज हकीकत यह है कि न्याय की उम्मीद लेकर आयोगों (Consumer Commissions) के दरवाजे खटखटाने वाला उपभोक्ता खुद ही ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
जहां एक ओर सरकार 'उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019' में नए संशोधनों की तैयारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत यह है कि मौजूदा तंत्र अपनी जवाबदेही, संसाधनों और कार्यक्षमता के गंभीर संकट से जूझ रहा है। क्या नींव कमजोर होने पर इमारत की ऊंचाई बढ़ाना सही है?
यह प्रश्न आज न केवल नीति निर्माताओं के लिए, बल्कि हर उस नागरिक के लिए प्रासंगिक है जो बाजार की चालाकियों का शिकार होता है।
1. 'न्याय' में देरी: एक काला सच
कानून कहता है कि उपभोक्ता विवादों का निपटारा तीन से पांच महीने के भीतर हो जाना चाहिए। लेकिन 'कंज्यूमर जस्टिस रिपोर्ट' के नवीनतम आंकड़े इस वादे पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं:
- न्याय में लगने वाला समय: औसतन, एक केस को सुलझने में 600 दिन का लंबा समय लग रहा है। यह देरी न केवल आर्थिक रूप से उपभोक्ता को तोड़ देती है, बल्कि मानसिक रूप से भी हतोत्साहित करती है।
- जवाबदेही का अभाव: मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत द्वारा विशेष न्यायाधिकरणों को 'जवाबदेही की कमी वाला क्षेत्र' बताना एक बड़ी चेतावनी है। उपभोक्ता आयोगों में देरी और अदालती आदेशों का पालन न होना अब एक सामान्य बात हो गई है, जिसके लिए किसी भी अधिकारी या तंत्र की जिम्मेदारी तय नहीं की जा रही है।
2. बुनियादी ढांचे का संकट: डेटा की जुबानी
उपभोक्ता आयोगों की दयनीय स्थिति को समझने के लिए हमें इन चार प्रमुख बिंदुओं पर गौर करना होगा:
| समस्या का क्षेत्र | गंभीरता का स्तर |
|---|---|
| रिक्त पद | अध्यक्षों और सदस्यों के पदों पर नियुक्तियां नहीं होना सबसे बड़ी बाधा है। कई राज्य आयोग वर्षों से बिना प्रमुख के चल रहे हैं। |
| पहुंच की कमी | देश के हर 10 में से 1 जिले में आज भी कोई सक्रिय उपभोक्ता आयोग नहीं है, जिससे ग्रामीण आबादी न्याय से कोसों दूर है। |
| वित्तीय संसाधन | 22 राज्यों में प्रति व्यक्ति औसत खर्च मात्र 2 रुपये है, जो कि अपर्याप्त बजट की स्पष्ट तस्वीर है। |
| स्टाफ का अभाव | प्रशासनिक कर्मचारियों की कमी के कारण फाइलों का प्रबंधन और केस लिस्टिंग अव्यवस्थित है। |
3. सिस्टम क्यों फेल हो रहा है?
उपभोक्ता आयोगों के विफल होने के पीछे सिर्फ बजट नहीं, बल्कि कार्यप्रणाली भी जिम्मेदार है। आज यह व्यवस्था खुद 'जटिलता' का शिकार हो गई है:
शुरुआत में यह व्यवस्था आम लोगों के लिए थी, लेकिन आज कुल केसों में से आधे केस बीमा, आवास और बैंकिंग जैसे जटिल क्षेत्रों से जुड़े हैं। इसका मतलब है कि सिस्टम पर उन विवादों का बोझ है जिन्हें तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत है, लेकिन हमारे आयोगों के पास न तो पर्याप्त तकनीकी स्टाफ है और न ही संसाधन।
इसके अलावा, लोक अदालतों का कम होता उपयोग यह साबित करता है कि जनता का इस व्यवस्था से भरोसा उठ गया है। 2022 से 2024 के बीच लोक अदालतों में भेजे गए मामलों की संख्या में भारी कमी आई है, जो यह दर्शाता है कि विवाद अब आयोगों के बजाय निजी तौर पर रफा-दफा किए जा रहे हैं या अनसुलझे रह रहे हैं।
4. सुधार की दिशा: माया दारूवाला के दृष्टिकोण से
लेखक माया दारूवाला का मानना है कि सुधार के लिए हमें 'मैक्रो' (बड़े) कानूनों से ज्यादा 'माइक्रो' (बुनियादी) बदलावों की जरूरत है:
- समयबद्ध नियुक्तियां: न्यायिक रिक्तियों को भरने के लिए एक स्थायी मैकेनिज्म होना चाहिए, ताकि बेंच कभी खाली न रहे।
- संसाधनों का विकेंद्रीकरण: बजट को केंद्रीय स्तर के बजाय जिला स्तर की जरूरतों के हिसाब से आवंटित करना होगा।
- मध्यस्थता को बढ़ावा: कानून के बजाय समझौते और मध्यस्थता (Mediation) को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि अदालतों का बोझ कम हो।
- पारदर्शी डेटा: प्रत्येक राज्य आयोग को अपने डेटा को रियल-टाइम डैशबोर्ड पर अपडेट करना चाहिए ताकि जनता को पता चले कि न्याय कहां अटका है।
निष्कर्ष: विश्वास बहाली की चुनौती
उपभोक्ता न्याय प्रणाली में कानून बदलना महज एक मरहम लगाने जैसा है, जबकि घाव अंदरूनी और गहरे हैं। न्याय प्रणाली की सफलता कानून की धाराओं में नहीं, बल्कि उस पर जनता के भरोसे में निहित है। यदि हम एक मजबूत बाजार बनाना चाहते हैं, तो हमें पहले एक मजबूत न्याय प्रणाली सुनिश्चित करनी होगी।
जब तक आम आदमी को यह भरोसा नहीं होगा कि उसे कम समय और कम खर्च में न्याय मिलेगा, तब तक बड़े-बड़े कानून कागज के पुलिंदे बनकर ही रह जाएंगे। समय आ गया है कि सरकार सुधारों के नाम पर नए कानून पेश करने के बजाय, मौजूदा तंत्र की 'मरम्मत' को अपनी पहली प्राथमिकता बनाए।

