Gig Economy Monthly Churn Challenge: भारत में क्विक-कॉमर्स (Quick-Commerce) और ऐप-आधारित डिलीवरी मॉडल्स के तेजी से बढ़ने के साथ ही गिग इकोनॉमी (Gig Economy) का दायरा बहुत बड़ा हो गया है. लेकिन इस सेक्टर की सबसे बड़ी खूबी यानी काम करने की लचीली सुविधा (Ultra-Flexibility) अब कंपनियों के लिए एक बड़ा सिरदर्द बनती जा रही है.
भारतीय गिग इकोनॉमी इस समय एक बड़े 'रिवॉल्विंग-डोर इफेक्ट' (Revolving-Door Effect) यानी कर्मचारियों के लगातार आने-जाने की समस्या से जूझ रही है, जहां हर महीने औसतन 20% से 30% वर्कफोर्स प्लेटफॉर्म बदल देती है या काम छोड़ देती है.
हाल ही में ANI News को दिए एक विशेष इंटरव्यू में क्विक-कॉमर्स यूनिकॉर्न कंपनी जेप्टो (Zepto) के पब्लिक पॉलिसी डायरेक्टर निखिल दहिया (Nikhil Dahiya) ने इस भारी मंथली चर्न (Worker Churn) को लेकर चिंता जताई है. उन्होंने इसे इंडस्ट्री के लिए एक निश्चित और गंभीर चुनौती करार दिया है.
ऐप्स बदलना और प्राकृतिक कारण: क्यों हो रहा है इतना अधिक चर्न?
फिक्की (FICCI), ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ एम्पलाइज (AIOE) और इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) द्वारा आयोजित एक संयुक्त हितधारक परामर्श बैठक के इतर जेप्टो के डायरेक्टर ने इस पर विस्तार से बात की:
- लगातार ऐप्स बदलना: निखिल दहिया ने बताया कि गिग वर्कर्स अपनी सुविधा और बेहतर इंसेंटिव्स के चक्कर में बहुत तेजी से कई ऐप्स के बीच स्विच करते रहते हैं.
- प्राकृतिक और मौसमी कारण: त्योहारों, खेती के सीजन या पैतृक गांवों की ओर लौटने जैसे प्राकृतिक कारणों से भी हर महीने डिलीवरी पार्टनर्स की संख्या में बड़ा उतार-चढ़ाव देखा जाता है.
- इंडस्ट्री का आंकड़ा: उन्होंने स्पष्ट किया कि इस सेक्टर के बेहद लचीले स्वभाव के कारण आप गिग इकोनॉमी में हर महीने आराम से 20 से 30 प्रतिशत तक की गिरावट या लेबर चर्न की उम्मीद कर सकते हैं.
सोशल सेक्टोरल नेट: डिलीवरी पार्टनर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा की मांग
इस भारी उतार-चढ़ाव को रोकने और वर्कफोर्स को स्थिरता देने के लिए जेप्टो के डायरेक्टर ने एक एकीकृत, ढांचागत सामाजिक सुरक्षा नेट (Social Security Net) स्थापित करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया है. इस परामर्श बैठक में केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय के अधिकारियों ने भी भाग लिया, जहां मुख्य ध्यान लेबर कोड के तहत 'ग्रीवांस रिड्रेसल सिस्टम' (शिकायत निवारण प्रणाली) को मजबूत करने पर था.
रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स मुख्य रूप से तीन प्रकार के सुरक्षा कवरेज की मांग कर रहे हैं:
- बीमा सुरक्षा (Insurance Protection): इसके अंतर्गत दुर्घटना, स्वास्थ्य और जीवन बीमा का पूर्ण कवरेज शामिल है, जो सड़कों पर काम करने वाले इन पार्टनर्स के लिए सबसे आवश्यक है.
- मातृत्व लाभ (Maternity Benefits): महिला गिग वर्कर्स की बढ़ती संख्या को देखते हुए इस सुरक्षा ढांचे को मजबूत करना.
- वृद्धावस्था प्रावधान (Old-Age Provisions): लंबी अवधि के लिए भविष्य निधि या पेंशन जैसे लाभ, जो नए सामाजिक सुरक्षा कोड का भी हिस्सा हैं.
गिग इकोनॉमी चर्न और सुरक्षा ढांचा (Quick Summary Table)
जेप्टो के अधिकारी द्वारा साझा किए गए आंकड़ों और सामाजिक सुरक्षा के मुख्य बिंदुओं का पूरा विवरण इस तालिका में स्पष्ट रूप से दिया गया है:
| प्रमुख पहलू / डेटा पॉइंट (Aspect) | मुख्य जानकारी और विश्लेषण (Key Details) |
|---|---|
| मासिक वर्कफोर्स गिरावट (Monthly Churn) | 20% से 30% प्रति महीना (एक प्लेटफॉर्म से दूसरे पर जाना) |
| डेटा साझा करने वाले अधिकारी | निखिल दहिया, डायरेक्टर ऑफ पब्लिक पॉलिसी (Zepto) |
| वर्कर्स की प्राथमिक मांगें | दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य कवरेज, मैटरनिटी बेनिफिट और ओल्ड-एज प्रोविजन. |
| इंडस्ट्री का दृष्टिकोण | कंपनियां सामाजिक सुरक्षा को प्रतिस्पर्धा (Competition) के रूप में नहीं देखतीं, सामूहिक काम करने की सहमति है. |
| योगदान का मॉडल (Contribution) | प्रत्येक कंपनी को गिग वर्कर द्वारा उनके प्लेटफॉर्म पर किए गए काम की मात्रा (Quantum of Work) के आधार पर फंड में योगदान देना होगा. |
विद्यार्थियों और नौकरीपेशा लोगों के लिए सप्लीमेंट्री इनकम का जरिया
एक महत्वपूर्ण पहलू पर बात करते हुए जेप्टो के अधिकारी ने कहा कि गिग वर्क आज के समय में केवल फुल-टाइम करियर नहीं रह गया है. यह छात्रों, क्लर्कों या सुरक्षा गार्डों के लिए अपनी नियमित नौकरियों के बाद शाम के समय में अतिरिक्त या पूरक आय (Supplementary Income) अर्जित करने का एक बेहतरीन माध्यम बन चुका है. चूंकि इसे कभी भी ज्वाइन या छोड़ा जा सकता है, इसलिए इसका टर्नओवर रेशियो हमेशा अन्य सेक्टर्स से अधिक रहता है.
निष्कर्ष: गिग इकोनॉमी में 20-30% का यह मासिक चर्न कंपनियों के ऑपरेशनल कॉस्ट को तो बढ़ाता ही है, साथ ही यह संगठित सामाजिक सुरक्षा नीतियों की कमी को भी उजागर करता है. यदि आने वाले समय में आईएलओ (ILO) और सरकार के साथ मिलकर कंपनियां एक मजबूत सुरक्षा ढांचा तैयार करती हैं, तो यह लेबर मार्केट की अस्थिरता को कम करने में गेम-चेंजर साबित होगा.
मूल स्रोत और विस्तृत रिपोर्ट देखें: इस खबर से जुड़े अधिक नीतिगत बयानों और आधिकारिक इंटरव्यू को पढ़ने के लिए आप ANI News Official Business Report पर जा सकते हैं.
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