पीएम मोदी विदेश दौरे पर पत्रकारों के सवाल क्यों नहीं लेते हैं? जानिए नॉर्वे प्रेस कॉन्फ्रेंस का पूरा विवाद | JanDrishti Today

Praveen Yadav
0

पीएम मोदी विदेश दौरे पर पत्रकारों के सवाल क्यों नहीं लेते हैं? जानिए नॉर्वे प्रेस कॉन्फ्रेंस का पूरा विवाद और विदेश मंत्रालय का जवाब

नई दिल्ली / ओस्लो: भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरों और उनकी मीडिया नीति को लेकर एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ गई है। हाल ही में पीएम मोदी पांच देशों की अपनी आधिकारिक यात्रा के चौथे पड़ाव पर नॉर्वे पहुंचे थे। इस दौरे के दौरान नॉर्वे की एक महिला पत्रकार द्वारा प्रधानमंत्री से पूछे गए तीखे सवालों और उसके बाद सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो ने एक बड़ा राजनीतिक और कूटनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है।

यह विवाद केवल एक सवाल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने भारत में प्रेस की स्वतंत्रता (Press Freedom), अभिव्यक्ति की आजादी और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के मीडिया प्रबंधन के तौर-तरीकों को एक बार फिर वैश्विक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। विपक्षी दल जहां इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर हैं, वहीं भारत सरकार और विदेश मंत्रालय (MEA) ने विदेशी मीडिया के इस रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई है और इसे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमतर आंकने की कोशिश करार दिया है।

“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पारंपरिक मीडिया नीति के तहत अक्सर खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से बचते आए हैं। लेकिन जब वे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर होते हैं, तो विदेशी पत्रकारों के अप्रत्याशित और सीधे सवाल कभी-कभी असहज स्थितियां पैदा कर देते हैं। नॉर्वे में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला।”

नॉर्वे का वो वाकया जिसने मचाया बवाल: क्या हुआ था प्रेस कॉन्फ्रेंस में?

पूरा मामला नॉर्वे में आयोजित एक प्रेस ब्रीफिंग से शुरू हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री के संयुक्त वक्तव्य के बाद, जब पीएम मोदी मंच से प्रस्थान कर रहे थे, तभी नॉर्वे की एक स्वतंत्र पत्रकार ‘हेला लयंग’ (Hela Lyeng) ने उन्हें रोकने की कोशिश की।

महिला पत्रकार ने सीधे अंग्रेजी में सवाल दागा— “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे बड़ी प्रेस (फ्री प्रेस) के सामने अपने ही देश में पत्रकारों के सवाल क्यों नहीं लेते हैं? (Why don't you take some questions from the freest press in the world?)”

वीडियो साक्ष्यों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, यह सवाल इतना अचानक और अप्रत्याशित था कि कुछ पलों के लिए वहां मौजूद अधिकारी और सुरक्षाकर्मी भी असहज हो गए। प्रधानमंत्री मोदी बिना कोई सीधा जवाब दिए, हल्की मुस्कान और अपनी चिर-परिचित शारीरिक मुद्रा के साथ आगे बढ़ गए। लेकिन विवाद यहीं नहीं थमा। महिला पत्रकार ने प्रधानमंत्री का पीछा लिफ्ट के पास तक किया और लगातार अपनी बात दोहराती रही, जिसे उन्होंने बाद में अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) पर भी पोस्ट किया।

विदेशी पत्रकार हेला लयंग का दावा और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

सवाल पूछने वाली पत्रकार हेला लयंग ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा कि भारत के प्रधानमंत्री ने उनके सवाल का जवाब नहीं दिया, हालांकि उन्हें पहले से ही इस बात की उम्मीद थी। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा:

“नॉर्वे वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (World Press Freedom Index) में पहले स्थान पर है, जबकि भारत इस सूची में काफी नीचे संघर्ष कर रहा है। जिन देशों और सरकारों के साथ हमारा मुल्क सहयोग और कूटनीतिक संबंध साझा करता है, उनसे मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल पूछना एक पत्रकार के रूप में हमारा बुनियादी कर्तव्य है।”

इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया दो गुटों में बंट गया। एक धड़ा जहां पत्रकार की इस हिम्मत की तारीफ कर रहा है और भारत में मीडिया की स्थिति पर चिंता जता रहा है, वहीं दूसरा धड़ा इसे प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक और विदेशी मीडिया द्वारा भारतीय राष्ट्रप्रमुख को जानबूझकर नीचा दिखाने की साजिश बता रहा है।

विदेश मंत्रालय (MEA) का तीखा रुख

विवाद बढ़ने के बाद जब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल और पश्चिमी मामलों के सचिव सिबी जॉर्ज ने प्रेस वार्ता की, तो वहां भी नॉर्वे और अन्य अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारों ने इसी मुद्दे को दोबारा उठाया। इस बार मानवाधिकारों और भारत में प्रेस की आजादी को लेकर तीखे सवाल पूछे गए।

इन सवालों पर भारत के वरिष्ठ राजनयिक और सचिव सिबी जॉर्ज ने बेहद कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया। उन्होंने पत्रकार को बीच में टोकने से मना करते हुए कहा कि भारत की लोकतांत्रिक और मीडिया व्यवस्था को ठीक से समझे बिना इस तरह के आरोप लगाना पूरी तरह गलत है।

  • विशाल मीडिया नेटवर्क: भारत में सैकड़ों समाचार चैनल और हजारों समाचार पत्र विभिन्न भाषाओं में काम कर रहे हैं।
  • विदेशी दौरों का प्रोटोकॉल: विदेश मंत्रालय द्वारा पूरी पारदर्शिता के साथ मीडिया ब्रीफिंग दी जाती है।
  • वैश्विक योगदान: भारत ने कोविड महामारी जैसे संकटों में दुनिया की मदद की और खुद को जिम्मेदार वैश्विक शक्ति साबित किया।

आखिर पीएम मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते?

1. सीधे संवाद की रणनीति

पीएम मोदी और बीजेपी का मानना है कि सोशल मीडिया, ‘मन की बात’ और जनसभाओं के जरिए सीधे जनता से जुड़ना अधिक प्रभावी है।

2. गुजरात दंगों के बाद मीडिया से दूरी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2002 के बाद मीडिया के एक वर्ग के साथ तनावपूर्ण संबंधों ने उनकी मीडिया रणनीति को प्रभावित किया।

3. नैरेटिव कंट्रोल

खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस में असहज सवालों का जोखिम होता है, इसलिए सरकार नियंत्रित संवाद को प्राथमिकता देती है।

अंतर्राष्ट्रीय दौरों पर पहले भी हो चुके हैं ऐसे वाकये

  1. ब्रिटेन दौरा (2015): असहिष्णुता पर सवाल पूछे गए थे।
  2. अमेरिका दौरा (2023): अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर सवाल उठा था।

निष्कर्ष

नॉर्वे में हुआ यह विवाद केवल एक प्रेस सवाल नहीं था, बल्कि इसने वैश्विक मंचों पर भारत की मीडिया और लोकतांत्रिक छवि पर नई बहस छेड़ दी है। जहां भारत सरकार विदेशी मीडिया के सवालों को पूर्वाग्रह मानती है, वहीं आलोचक इसे लोकतांत्रिक जवाबदेही से जोड़कर देखते हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत अपनी वैश्विक छवि और घरेलू मीडिया रणनीति के बीच किस प्रकार संतुलन बनाता है।


© 2026 JanDrishti Today. सभी अधिकार सुरक्षित।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Please Select Embedded Mode To show the Comment System.*