KGMU में करोड़ों के दवा घोटाले की आशंका: कैंसर मरीजों के नाम पर फर्जी इंजेक्शन, असाध्य योजना पर उठे गंभीर सवाल

Praveen Yadav
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लखनऊ। प्रदेश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में शामिल किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में कैंसर मरीजों के इलाज के लिए संचालित असाध्य योजना के तहत करोड़ों रुपये की दवाओं और इंजेक्शनों में कथित अनियमितताओं का मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मच गया है। प्रारंभिक जांच में ऐसे संकेत मिले हैं कि यूरोलॉजी विभाग में महंगी दवाओं और इंजेक्शनों की खपत को लेकर गंभीर स्तर पर नियमों की अनदेखी की गई। कुछ मामलों में ऐसे इंजेक्शन, जिन्हें चिकित्सकीय मानकों के अनुसार छह माह में एक बार लगाया जाना चाहिए था, उन्हें कागजों पर एक ही महीने में कई बार दर्शाया गया।

लखनऊ। प्रदेश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में शामिल किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में कैंसर मरीजों के इलाज के लिए संचालित असाध्य योजना के तहत करोड़ों रुपये की दवाओं और इंजेक्शनों में कथित अनियमितताओं का मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मच गया है। 


प्रारंभिक जांच में ऐसे संकेत मिले हैं कि यूरोलॉजी विभाग में महंगी दवाओं और इंजेक्शनों की खपत को लेकर गंभीर स्तर पर नियमों की अनदेखी की गई। कुछ मामलों में ऐसे इंजेक्शन, जिन्हें चिकित्सकीय मानकों के अनुसार छह माह में एक बार लगाया जाना चाहिए था, उन्हें कागजों पर एक ही महीने में कई बार दर्शाया गया।


मामले की गंभीरता को देखते हुए KGMU प्रशासन ने संबंधित दवाओं और इंजेक्शनों के बिलों का भुगतान तत्काल प्रभाव से रोक दिया है। साथ ही कुलपति के निर्देश पर पूरे प्रकरण की जांच के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित की गई है। समिति मरीजों के रिकॉर्ड, दवा वितरण रजिस्टर, इंजेक्शन की खपत, खरीद और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की विस्तृत जांच करेगी।


गरीब कैंसर मरीजों के लिए बनी योजना पर सवाल

असाध्य योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराना है। इस योजना के तहत कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों के मरीजों को महंगी दवाएं और इंजेक्शन निशुल्क उपलब्ध कराए जाते हैं।


यूरोलॉजी विभाग में प्रोस्टेट कैंसर, किडनी कैंसर, मूत्राशय कैंसर और अन्य जटिल यूरोलॉजिकल कैंसर रोगियों का इलाज किया जाता है। आरोप है कि इन्हीं मरीजों के नाम पर बड़ी मात्रा में महंगी दवाओं की खपत दिखाई गई और सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका पैदा हुई।


यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं होगा, बल्कि गरीब मरीजों के नाम पर सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के दुरुपयोग का गंभीर उदाहरण भी माना जाएगा।


अचानक कई गुना बढ़ गया दवाओं का खर्च

मामले की शुरुआत तब हुई जब विभाग में दवाओं की खपत और बजट में असामान्य वृद्धि दर्ज की गई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अक्टूबर और नवंबर 2025 के दौरान विभाग में हर महीने लगभग 10 लाख रुपये मूल्य की दवाओं की खपत दर्ज हो रही थी।


लेकिन फरवरी 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर करीब 40 लाख रुपये प्रतिमाह पहुंच गया। इसके बाद मार्च 2026 में दवा खर्च 45 लाख रुपये से भी अधिक दर्ज किया गया।


महज चार से पांच महीनों के भीतर दवा बजट में हुई इस अप्रत्याशित वृद्धि ने प्रशासनिक अधिकारियों का ध्यान अपनी ओर खींचा। शुरुआती स्तर पर इसे मरीजों की संख्या में वृद्धि का परिणाम माना गया, लेकिन बाद में जब बिलों और चिकित्सकीय अभिलेखों का मिलान किया गया तो कई गंभीर विसंगतियां सामने आने लगीं।


ऑडिट में सामने आईं कई खामियां

दवा खपत के आंकड़ों में अचानक उछाल के बाद अधिकारियों ने डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन, मरीजों के रिकॉर्ड और भुगतान से संबंधित दस्तावेजों का ऑडिट शुरू कराया।


जांच के दौरान यह पाया गया कि कई मरीजों को दवाएं और इंजेक्शन चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के अनुरूप नहीं दर्शाए गए थे। कुछ मामलों में मरीजों को ऐसे इंजेक्शन कागजों पर बार-बार लगाए गए, जिनकी निर्धारित खुराक और अंतराल कहीं अधिक लंबा होता है।


यही वह बिंदु था जिसने संभावित घोटाले की आशंका को मजबूत किया।


छह महीने वाला इंजेक्शन एक महीने में कई बार

प्रारंभिक जांच में सबसे गंभीर अनियमितता इंजेक्शनों की डोजिंग और समय अंतराल को लेकर सामने आई है।


अधिकारियों के अनुसार कुछ मरीजों के रिकॉर्ड में आयरन और प्रोटीन संबंधी इंजेक्शन एक ही महीने में चार से पांच बार लगाए जाने का उल्लेख मिला। जबकि चिकित्सा मानकों के अनुसार ऐसे इंजेक्शन कई मामलों में छह महीने के अंतराल पर लगाए जाते हैं।


इन इंजेक्शनों की कीमत प्रति डोज आठ हजार से दस हजार रुपये तक बताई जा रही है। ऐसे में यदि एक मरीज के नाम पर कई अतिरिक्त डोज दिखाई गई हों तो कुल वित्तीय नुकसान लाखों रुपये तक पहुंच सकता है।


जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि वास्तव में इंजेक्शन मरीजों को लगाए गए थे या केवल दस्तावेजों में उनकी खपत दर्ज की गई।


भर्ती नियमों की भी अनदेखी

मामले में एक और महत्वपूर्ण बिंदु सामने आया है। सूत्रों के अनुसार कैंसर मरीजों को कुछ विशेष दवाएं और इंजेक्शन देने से पहले भर्ती प्रक्रिया पूरी करना अनिवार्य होता है।


लेकिन जांच के दौरान ऐसे संकेत मिले हैं कि कई मामलों में इस नियम का पालन नहीं किया गया। मरीजों के भर्ती रिकॉर्ड और दवा वितरण अभिलेखों के बीच अंतर मिलने की भी बात कही जा रही है।


यदि यह तथ्य सही पाया जाता है तो मामला केवल वित्तीय गड़बड़ी तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि चिकित्सा प्रक्रियाओं के उल्लंघन का भी बन सकता है।


तीन करोड़ रुपये तक की गड़बड़ी की आशंका

प्रारंभिक स्तर पर अधिकारियों ने करीब तीन करोड़ रुपये की दवाओं और इंजेक्शनों में संभावित अनियमितता की आशंका व्यक्त की है।


हालांकि यह राशि अंतिम जांच रिपोर्ट आने तक अनुमानित मानी जा रही है। समिति द्वारा सभी रिकॉर्ड की जांच के बाद ही वास्तविक वित्तीय नुकसान का आकलन किया जा सकेगा।


फिर भी स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इतनी बड़ी राशि की अनियमितता साबित होती है तो यह हाल के वर्षों में किसी सरकारी चिकित्सा संस्थान में सामने आए सबसे बड़े दवा घोटालों में से एक हो सकता है।


संविदा कर्मचारी को सौंपी गई जिम्मेदारी पर सवाल

मामले में एक और गंभीर आरोप सामने आया है। बताया जा रहा है कि यूरोलॉजी विभाग में असाध्य योजना की दवाओं और इंजेक्शनों के प्रबंधन की जिम्मेदारी एक कथित रूप से पसंदीदा संविदा कर्मचारी को सौंप दी गई थी।


आरोप है कि दवा प्रबंधन जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निर्धारित प्रक्रियाओं के बजाय विशेष प्रभाव के आधार पर दी गई। अब जांच समिति इस पहलू की भी पड़ताल करेगी कि दवाओं के वितरण, रिकॉर्ड रखरखाव और बिलिंग प्रक्रिया में किन-किन कर्मचारियों की भूमिका थी।


KGMU प्रशासन की कार्रवाई

मामला उजागर होने के बाद KGMU प्रशासन ने तत्काल कदम उठाते हुए संदिग्ध बिलों के भुगतान पर रोक लगा दी है। इसके साथ ही पांच सदस्यीय जांच समिति गठित की गई है।


समिति को रिकॉर्ड सत्यापन, दवा खपत का मिलान, मरीजों की फाइलों की जांच और भुगतान प्रक्रिया की समीक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई है। जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारियों, डॉक्टरों और कर्मचारियों से भी पूछताछ की जा सकती है।


प्रशासन का कहना है कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष होगी और यदि किसी भी स्तर पर दोष सिद्ध होता है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।


स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल

यह मामला केवल एक विभाग या संस्थान तक सीमित नहीं है। यह सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की निगरानी व्यवस्था, दवा वितरण प्रणाली और वित्तीय पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करता है।


असाध्य योजना जैसी योजनाएं उन मरीजों के लिए जीवनरेखा मानी जाती हैं जो महंगे इलाज का खर्च उठाने में सक्षम नहीं होते। ऐसे में यदि मरीजों के नाम पर फर्जी खपत दिखाकर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया है तो यह न केवल आर्थिक अपराध है बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में जनता के विश्वास को भी प्रभावित करने वाला मामला है।


अब सभी की नजरें जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि करोड़ों रुपये की दवा खपत के पीछे वास्तविकता क्या है और इस पूरे मामले में जिम्मेदार कौन हैं।

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