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कैटगरी (Niche): नेशनल न्यूज़ / आदिवासी राजनीति / विशेष विश्लेषण
घटनाक्रम तिथि: 24-25 मई 2026 | आयोजन: जनजाति सुरक्षा मंच (JSM) रैली, दिल्ली
देश की राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक लाल किला मैदान एक बार फिर एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन का गवाह बना है। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के ऐतिहासिक अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े जनजाति सुरक्षा मंच (JSM) के बैनर तले देश भर के लाखों आदिवासियों ने दिल्ली में डेरा डाला। आयोजकों का दावा है कि इस महा-रैली (जनजाति सांस्कृतिक समागम) में 500 से अधिक आदिवासी समुदायों के 1.5 लाख से ज्यादा लोग पारंपरिक वेशभूषा और वाद्ययंत्रों के साथ शामिल हुए।
इस मेगा रैली का मुख्य उद्देश्य संसद में बेहद विवादित 'डीलिस्टिंग बिल' (Delisting Bill) को पारित करने की मांग करना था। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भी मौजूद रहीं, जिसने इस आंदोलन को और अधिक राजनीतिक अहमियत दे दी है। लेकिन आखिर यह 'डीलिस्टिंग' क्या है? क्यों आदिवासी समाज का एक बड़ा हिस्सा इसके समर्थन में सड़कों पर उतरा है और विपक्षी दल इसका विरोध क्यों कर रहे हैं? आइए इस पूरे मामले का निष्पक्ष और विस्तृत विश्लेषण करते हैं।
क्या है डीलिस्टिंग (Delisting) और इसकी मूल मांग क्या है?
सरल शब्दों में कहें तो 'डीलिस्टिंग' का अर्थ है—"किसी को स्थापित सूची से बाहर करना।" जनजाति सुरक्षा मंच और इस आंदोलन के समर्थकों की मांग है कि जो आदिवासी मूल सनातन, पारंपरिक या जनजातीय संस्कृति-पद्धति को छोड़कर ईसाई (Christianity) या इस्लाम (Islam) धर्म अपना चुके हैं, उन्हें संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत मिलने वाली अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची से बाहर किया जाए।
आंदोलनकारियों का तर्क है कि जब कोई व्यक्ति या समूह अपनी मूल जनजातीय संस्कृति, रीति-रिवाजों और पूजा पद्धतियों को त्याग देता है, तो वह आदिवासी होने की मूल परिभाषा (लोकुर समिति के मापदंडों के अनुसार) से दूर हो जाता है। इसलिए, धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों को अनुसूचित जनजाति के तहत मिलने वाले आरक्षण (नौकरियों, शिक्षा, और चुनावों में) और अन्य सरकारी योजनाओं के लाभों से वंचित किया जाना चाहिए। इस विषय पर देश के विभिन्न मीडिया नजरियों और विशेष कवरेज को आप Jansatta (जनसत्ता) की आधिकारिक वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं।
समर्थकों का तर्क: 'तिहरे लाभ' (Triple Benefit) का मिल रहा है नाजायज फायदा
लाल किले के मैदान में जुटे आदिवासी नेताओं और संघ समर्थित संगठनों ने इस मांग के पीछे कई महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक तर्क दिए हैं:
- संसाधनों का असमान वितरण: प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि जो आदिवासी ईसाई मिशनरियों या अन्य माध्यमों से धर्म परिवर्तन कर चुके हैं, वे आर्थिक और शैक्षणिक रूप से अधिक मजबूत हो गए हैं। इसका नतीजा यह है कि एसटी (ST) आरक्षण का 80 से 90 प्रतिशत लाभ यहीConverted आदिवासी उठा ले जाते हैं, जबकि दूरदराज के जंगलों में रहने वाला मूल गैर-converted गरीब आदिवासी आज भी वंचित है।
- तिहरा लाभ मिलने का आरोप: जनजाति सुरक्षा मंच के नेताओं का कहना है कि धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों को चर्च या विदेशी फंडिंग का सहारा मिलता है, साथ ही वे अल्पसंख्यक (Minority) होने का लाभ भी लेते हैं और एसटी कोटे का फायदा भी उठा रहे हैं। यह उन आदिवासियों के साथ अन्याय है जो अपनी परंपराओं को बचाए हुए हैं।
एक नजर में: डीलिस्टिंग विवाद, पक्ष-विपक्ष और संवैधानिक स्थिति
इस पूरे पेचीदा मामले को नीचे दी गई तालिका के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है:
| विषय (Topic) | समर्थक / जेएसएम का पक्ष (Pro-Delisting) | विपक्ष / आलोचकों का पक्ष (Anti-Delisting) |
|---|---|---|
| मूल मांग (Core Demand) | ईसाई या इस्लाम अपनाने वाले आदिवासियों को एसटी (ST) लिस्ट से बाहर किया जाए। | सभी आदिवासियों के संवैधानिक और जन्मजात अधिकारों को अक्षुण्ण रखा जाए। |
| तर्क (Arguments) | धर्म बदलने से आदिवासी संस्कृति और पहचान खत्म होती है; कनवर्टेड लोग आरक्षण का अधिकांश लाभ हड़प रहे हैं। | आदिवासी पहचान जल, जंगल, जमीन और प्रकृति से जुड़ी है, न कि किसी विशेष धार्मिक कोडिंग से। |
| ऐतिहासिक संदर्भ | 1967 में इंदिरा गांधी सरकार के समय कार्तिक उरांव की संयुक्त संसदीय समिति ने भी इसकी सिफारिश की थी। | यह कदम आदिवासी समाज को आपस में बांटने और उनके जल-जंगल-जमीन के अधिकारों को कमजोर करने की राजनीतिक चाल है। |
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद 342 में संशोधन कर कनवर्टेड आदिवासियों पर रोक लगाने की मांग। | संविधान के तहत अनुसूचित जनजातियों का निर्धारण उनकी सामाजिक-भौगोलिक स्थिति पर होता है, धर्म पर नहीं (जैसे SC सूची में है)। |
विपक्ष और आदिवासी संगठनों का कड़ा विरोध: "यह बांटने की राजनीति है"
दिल्ली में हुए इस भारी शक्ति प्रदर्शन के बाद देश का सियासी पारा भी चढ़ गया है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर के कई गैर-भाजपा आदिवासी संगठनों और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इस आंदोलन पर तीखा हमला बोला है। झारखंड कांग्रेस और प्रमुख आदिवासी नेताओं का कहना है कि:
1. **मूल अधिकारों को कमजोर करने की साजिश:** विपक्ष का आरोप है कि केंद्र सरकार और आरएसएस मिलकर आदिवासियों को धर्म के नाम पर आपस में लड़ाना चाहते हैं, ताकि कॉर्पोरेट घरानों को आदिवासियों की जमीनों (जल, जंगल, जमीन) पर कब्जा करने में आसानी हो और 'वन अधिकार अधिनियम' को कमजोर किया जा सके।
2. **असली मुद्दों से ध्यान भटकाना:** विपक्षी नेताओं का तर्क है कि आज आदिवासी युवाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी, विस्थापन और कुपोषण है। सरकार इन बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए 'डीलिस्टिंग' का नया विवाद खड़ा कर रही है। देश की आंतरिक सुरक्षा और गृह मंत्रालय के इस मामले पर आधिकारिक दृष्टिकोण को जानने के लिए आप गृह मंत्रालय (MHA) की वेबसाइट देख सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs) - आदिवासी डीलिस्टिंग बिल विवाद
1. दिल्ली के लाल किले में आयोजित इस आदिवासी रैली का मुख्य एजेंडा क्या था?
इस रैली का आयोजन भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर 'जनजाति सुरक्षा मंच' द्वारा किया गया था। इसका मुख्य एजेंडा संसद से 'डीलिस्टिंग बिल' पास कराना है, ताकि धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासियों को एसटी आरक्षण की सूची से बाहर निकाला जा सके।
2. अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण नियमों में धर्म को लेकर क्या अंतर है?
संवैधानिक नियमों के अनुसार, यदि कोई दलित (SC) व्यक्ति ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाता है, तो उसका SC का दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है (केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म में ही यह मान्य है)। लेकिन एसटी (ST) के मामले में ऐसा कोई धार्मिक प्रतिबंध नहीं है; कोई आदिवासी चाहे जिस भी धर्म को माने, उसका एसटी दर्जा बरकरार रहता है। डीलिस्टिंग आंदोलन इसी नियम को बदलने की मांग कर रहा है।
3. क्या केंद्र सरकार ने डीलिस्टिंग बिल पर कोई आधिकारिक फैसला लिया है?
फिलहाल भारतीय जनता पार्टी या केंद्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर डीलिस्टिंग को अपनी मुख्य नीति के रूप में घोषित नहीं किया है। हालांकि, गृह मंत्री अमित शाह की इस रैली में उपस्थिति और संघ से जुड़े संगठनों के दबाव को देखते हुए कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले समय में सरकार इस विषय पर कोई बड़ा विधायी कदम उठा सकती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
दिल्ली में हुआ यह आदिवासी समागम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि 'डीलिस्टिंग' का मुद्दा अब केवल जंगलों या दूरदराज के इलाकों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की मुख्यधारा की राजनीति का एक बड़ा केंद्र बिंदु बनने जा रहा है।
जहां एक तरफ मूल संस्कृति और अधिकारों के संरक्षण की दलीलें मजबूत दिखाई देती हैं, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक ताने-बाने के टूटने और आदिवासियों के अधिकारों में कटौती का डर भी उतना ही वास्तविक है। अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है कि वह इस बेहद संवेदनशील और विस्फोटक मुद्दे पर समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर कैसे बीच का रास्ता निकालती है।

