बिहार में भरत तिवारी ‘एनकाउंटर’ पर उठे गंभीर सवाल: गांव में आक्रोश, पुलिस कार्रवाई कटघरे में, न्यायिक जांच का ऐलान

Praveen Yadav
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Bharat Tiwari Encounter Case Bihar: बिहार के भोजपुर जिले में 26 वर्षीय भरत भूषण तिवारी की कथित पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत ने पूरे राज्य में राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी है। जहां पुलिस इसे आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई बता रही है, वहीं परिवार, ग्रामीण और कई राजनीतिक दल इसे संदिग्ध बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से न्यायिक जांच कराने का ऐलान किया है।
Bharat Tiwari Encounter Case Bihar: बिहार के भोजपुर जिले में 26 वर्षीय भरत भूषण तिवारी की कथित पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत ने पूरे राज्य में राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी है। जहां पुलिस इसे आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई बता रही है, वहीं परिवार, ग्रामीण और कई राजनीतिक दल इसे संदिग्ध बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से न्यायिक जांच कराने का ऐलान किया है।

क्या है पूरा मामला?

भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव निवासी 26 वर्षीय भरत भूषण तिवारी की 17 जून को पुलिस कार्रवाई के दौरान गोली लगने से मौत हो गई। पुलिस के अनुसार, भरत हथियारबंद था और उसने पुलिस टीम के लिए खतरा पैदा किया था। इसी कारण आत्मरक्षा में गोली चलाई गई, जो उसके पैर में लगी।

हालांकि गांव वालों और परिजनों का दावा है कि घटना के समय भरत ने पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया था और अपनी पिस्टल पुलिस के हवाले कर दी थी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि उसने सरेंडर कर दिया था तो फिर गोली चलाने की जरूरत क्यों पड़ी।

सोशल मीडिया लाइव बना विवाद का केंद्र

घटना से ठीक पहले भरत तिवारी ने फेसबुक पर लाइव वीडियो किया था। ग्रामीणों का कहना है कि इस वीडियो में स्पष्ट दिखाई देता है कि भरत ने अपनी पिस्टल पुलिस की ओर फेंक दी थी और एक पुलिसकर्मी ने उसे उठा भी लिया था।

गांव के बुजुर्ग भारत पासवान कहते हैं, "अगर भरत ने हथियार छोड़ दिया था और आत्मसमर्पण कर दिया था, तो फिर पुलिस ने गोली क्यों चलाई? यही सबसे बड़ा सवाल है।"

यही वीडियो अब जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

पांच पुलिसकर्मी निलंबित, हत्या की एफआईआर दर्ज

जनाक्रोश और बढ़ते दबाव के बीच प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए शाहपुर थाना प्रभारी समेत पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है।

भरत की मां आशा देवी की शिकायत पर संबंधित एसडीपीओ, एसएचओ और अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है। हालांकि अभी तक किसी भी आरोपी पुलिसकर्मी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।

इस कार्रवाई के बावजूद परिवार का कहना है कि केवल निलंबन से न्याय नहीं मिलेगा।

मुख्यमंत्री ने न्यायिक जांच का किया ऐलान

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से न्यायिक जांच कराने की घोषणा की है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि जांच का उद्देश्य घटना के हर पहलू की निष्पक्ष और पारदर्शी समीक्षा करना है ताकि सच्चाई सामने आ सके।

यह कदम राज्य सरकार की ओर से बढ़ते राजनीतिक दबाव और जनाक्रोश के बीच उठाया गया है।

एडीजी ने मानी पुलिस की लापरवाही

घटना के पांच दिन बाद पहली बार मीडिया के सामने आए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजी) सुधांशु कुमार ने स्वीकार किया कि पुलिस स्तर पर गंभीर चूक हुई।

उन्होंने कहा कि 16 जून को जब पुलिसकर्मी भरत से बातचीत करने गए थे, तब स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता था।

एडीजी का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पहली बार किसी वरिष्ठ अधिकारी ने पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाया है।

पिता का आरोप: पुलिस ने मुझे पूरे दिन रोके रखा

भरत के पिता काशीनाथ तिवारी का आरोप है कि जब वे अपने बेटे के व्यवहार को लेकर पुलिस से बातचीत करने शाहपुर थाना पहुंचे थे, तब पुलिस ने उन्हें पूरे दिन थाने में रोके रखा।

उन्होंने कहा, "मैं घर जाने और परिवार से बात करने की गुहार लगाता रहा लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं सुनी। बाद में वही पुलिस मेरे बेटे की मौत की खबर लेकर आई।"

पिता का कहना है कि उन्होंने पुलिसकर्मियों को बुलेटप्रूफ जैकेट पहनकर निकलते देखा था, लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि यह अभियान उनके बेटे की जान ले लेगा।

मां की आंखों के सामने चली गोली

भरत की मां आशा देवी ने बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उन्होंने अपनी आंखों के सामने बेटे को गोली लगते देखा।

आशा देवी के अनुसार, पुलिस ने पहले भरत से बातचीत की और उसकी मांगें मानने का आश्वासन दिया। जब भरत ने पिस्टल पुलिस को सौंप दी, उसके बाद भी पुलिस ने गोली चला दी।

उन्होंने आरोप लगाया कि मौके पर मौजूद अधिकारियों ने उनके और उनकी बहू के साथ भी दुर्व्यवहार किया और लाठीचार्ज करवाया।

क्या मानसिक रूप से अस्वस्थ था भरत?

घटना से पहले पुलिस ने भरत तिवारी को "मानसिक रूप से अस्वस्थ" बताया था।

लेकिन गांव वालों का कहना है कि भरत सामाजिक मुद्दों को लेकर सक्रिय था और प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाता था। वह स्थानीय समस्याओं को लेकर लगातार संघर्ष कर रहा था।

ग्रामीण गणेशजी कहते हैं, "वह गुस्सैल जरूर था लेकिन पागल नहीं था। उसकी लड़ाई भ्रष्ट व्यवस्था और सरकारी लापरवाही से थी।"

विस्थापित गांव की लड़ाई लड़ रहा था भरत

जवइनिया गांव के लोगों के मुताबिक भरत तिवारी विस्थापित परिवारों के लिए संघर्ष कर रहा था।

दरअसल, नदी कटाव के कारण गांव उजड़ने के बाद लोगों को नई जगह बसाया गया था। लेकिन वहां जमीन काफी नीचे और गड्ढेनुमा है, जिससे बाढ़ और जलभराव का खतरा बना रहता है।

भरत लगातार प्रशासन से इस जमीन को भरवाने और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग कर रहा था।

ग्रामीणों का दावा है कि उसकी पहल पर गांव में बिजली और चापाकल जैसी सुविधाएं पहुंची थीं।

घटना स्थल पर अब भी मौजूद हैं खून के निशान

जवइनिया गांव के प्रवेश द्वार के पास वह स्थान आज भी लोगों को घटना की याद दिलाता है जहां भरत को गोली लगी थी।

ग्रामीण बताते हैं कि वहां अब भी खून के धब्बे दिखाई देते हैं और हर गुजरने वाला व्यक्ति उस दिन की घटना को याद करता है।

गांव में शोक के साथ-साथ गुस्से का माहौल भी बना हुआ है।

परिवार पर भी दर्ज हुई एफआईआर

मामले का एक और विवादित पहलू यह है कि पुलिस ने भरत तिवारी के पिता काशीनाथ तिवारी और भाई चंदन तिवारी के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की है।

इसके अलावा शव के साथ सड़क जाम करने के आरोप में 14 नामजद और 50 से अधिक अज्ञात लोगों पर भी मामला दर्ज किया गया है।

परिवार का कहना है कि न्याय मांगने वालों को ही आरोपी बनाया जा रहा है।

राजनीतिक गलियारों में गरमाया मामला

भरत तिवारी एनकाउंटर मामला अब बिहार की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया है।

बीजेपी नेताओं ने भी उठाए सवाल

भाजपा के वरिष्ठ नेता अश्विनी कुमार चौबे ने घटना को लोकतंत्र को शर्मसार करने वाला बताया है और उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।

भाजपा राष्ट्रीय सचिव रितुराज सिन्हा ने कहा कि "रक्षक भक्षक नहीं बनने चाहिए" और निष्पक्ष जांच जरूरी है।

भोजपुरी अभिनेता और भाजपा विधान पार्षद पवन सिंह ने भी पारदर्शी जांच की मांग उठाई है।

विपक्ष ने बताया ‘सरकारी हत्या’

कांग्रेस नेता अखिलेश प्रसाद सिंह ने इसे एनकाउंटर नहीं बल्कि हत्या बताया है। उन्होंने हाईकोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश की निगरानी में जांच और परिवार को एक करोड़ रुपये मुआवजा देने की मांग की।

राजद सांसद सुधाकर सिंह ने इसे "सरकारी मर्डर" करार देते हुए कहा कि केवल निलंबन से न्याय नहीं मिलेगा।

सीपीआई(एमएल) सांसद सुदामा प्रसाद ने भी राज्य में बढ़ती "एनकाउंटर संस्कृति" पर चिंता जताई है।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट को लेकर भी सवाल

परिजनों का आरोप है कि घटना के कई दिन बाद भी उन्हें पोस्टमार्टम रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई है।

परिवार का कहना है कि रिपोर्ट सार्वजनिक होने से मौत की वास्तविक परिस्थितियों पर प्रकाश पड़ सकता है।

यही कारण है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट को लेकर भी संदेह और सवाल लगातार बढ़ रहे हैं।

निष्कर्ष: न्यायिक जांच से सामने आएगी सच्चाई?

भरत तिवारी की मौत ने बिहार में पुलिस कार्रवाई, मानवाधिकारों और कानून व्यवस्था को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। एक तरफ पुलिस का दावा है कि उसने आत्मरक्षा में कार्रवाई की, वहीं दूसरी ओर वायरल वीडियो, परिवार के आरोप और ग्रामीणों की गवाही पुलिस के दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

अब सबकी नजर न्यायिक जांच पर टिकी है। यह जांच तय करेगी कि भरत तिवारी की मौत वास्तव में पुलिस मुठभेड़ थी या फिर एक ऐसा मामला जिसमें प्रक्रिया और शक्ति के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं।

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