नई दिल्ली: कई महीनों से पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। दोनों देशों के बीच युद्धविराम और समझौते की खबरों के बाद वैश्विक बाजारों में राहत का माहौल देखने को मिल रहा है। भारत के लिए भी यह समझौता बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर है।
अगर यह समझौता सफलतापूर्वक लागू हो जाता है तो इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, तेल की कीमतों, व्यापार, विदेश नीति और पश्चिम एशिया में रहने वाले लाखों भारतीयों पर पड़ सकता है।
तेल और गैस की कीमतों में मिल सकती है राहत
भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल और गैस आयात करता है। इसमें बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। हाल के महीनों में अमेरिका-ईरान संघर्ष और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बढ़े तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शांति समझौता लागू होता है और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है तो कच्चे तेल की आपूर्ति बेहतर होगी। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर दबाव कम होगा और भारत को सस्ता तेल मिल सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है होर्मुज़ जलडमरूमध्य?
दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। भारत को मिलने वाला खाड़ी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा भी इसी रास्ते से आता है।
संघर्ष के दौरान इस समुद्री मार्ग पर खतरा बढ़ने से शिपिंग लागत, बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई खर्च बढ़ गए थे। शांति समझौते के बाद यदि यह मार्ग पूरी तरह सुरक्षित होता है तो भारत को आयात लागत में बड़ी राहत मिल सकती है।
खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीयों को मिलेगा फायदा
खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ भारतीय काम करते हैं। इनमें बड़ी संख्या में श्रमिक, तकनीकी कर्मचारी और पेशेवर शामिल हैं। युद्ध और अस्थिरता की स्थिति में इन भारतीयों की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंता बनी हुई थी।
शांति समझौते के बाद क्षेत्र में स्थिरता आने से भारतीय नागरिकों की सुरक्षा मजबूत होगी। साथ ही रोजगार और कारोबार से जुड़ी गतिविधियां भी सामान्य होने की उम्मीद है।
भारत को बढ़ सकता है रेमिटेंस का लाभ
खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीय हर साल अरबों डॉलर भारत भेजते हैं। इसे रेमिटेंस कहा जाता है। यदि क्षेत्र में स्थिरता लौटती है तो रोजगार प्रभावित नहीं होंगे और भारत को विदेशी मुद्रा के रूप में मिलने वाला रेमिटेंस भी मजबूत बना रहेगा।
ईरानी तेल और गैस तक फिर बढ़ सकती है पहुंच
विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस भंडारों में से एक है। यदि समझौते के तहत प्रतिबंधों में राहत मिलती है तो भारत भविष्य में फिर से ईरानी तेल खरीदने पर विचार कर सकता है।
ईरानी कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए पहले भी एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। इससे भारत को ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने का मौका मिल सकता है।
चाबहार पोर्ट और INSTC परियोजना को मिल सकती है रफ्तार
भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में महत्वपूर्ण निवेश किया है। इसके अलावा इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) परियोजना भी भारत, ईरान और मध्य एशियाई देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए अहम मानी जाती है।
युद्ध और तनाव के कारण इन परियोजनाओं की प्रगति प्रभावित हुई थी। शांति समझौते के बाद इन योजनाओं को नई गति मिल सकती है, जिससे भारत को व्यापारिक और रणनीतिक दोनों तरह के फायदे होंगे।
क्या समझौता वास्तव में लागू होगा?
हालांकि कई विशेषज्ञ अभी भी इस समझौते को लेकर सतर्क हैं। उनका मानना है कि ईरान, अमेरिका, इजरायल, लेबनान और क्षेत्रीय संगठनों से जुड़े कई मुद्दे अभी पूरी तरह सुलझे नहीं हैं। ऐसे में अंतिम समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा।
इसके बावजूद यदि दोनों पक्ष समझौते की शर्तों का पालन करते हैं तो यह केवल पश्चिम एशिया ही नहीं बल्कि भारत समेत पूरी दुनिया के लिए राहत की खबर साबित हो सकती है।
निष्कर्ष
अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौता भारत के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इससे तेल और गैस की कीमतों में राहत, व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा, चाबहार पोर्ट परियोजना को गति, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और रेमिटेंस में स्थिरता जैसे कई लाभ मिल सकते हैं। हालांकि अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि यह समझौता जमीन पर कितना सफलतापूर्वक लागू हो पाता है।

