झुंझुनूं: राजस्थान के झुंझुनूं जिले का इस्लामपुर गांव इन दिनों राज्य की राजनीति और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गया है। गांव का नाम बदलकर ‘श्रीरामपुर’ करने की सिफारिश के बाद स्थानीय स्तर से लेकर प्रदेश की राजनीति तक चर्चा तेज हो गई है। जहां एक पक्ष इसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देख रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे गांव की विरासत और सामाजिक सौहार्द के खिलाफ कदम बता रहा है।
गांव में नाम परिवर्तन को लेकर माहौल गर्म है। कई ग्रामीणों का कहना है कि गांव में विकास, शिक्षा, रोजगार और पेयजल जैसी समस्याएं मौजूद हैं, लेकिन इन मुद्दों को छोड़कर नाम बदलने को प्राथमिकता दी जा रही है। वहीं कुछ लोगों का दावा है कि गांव का मूल नाम श्रीरामपुर था और इसे दोबारा उसी नाम से जाना जाना चाहिए।
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब स्थानीय भाजपा विधायक राजेंद्र भाम्बू ने 17 फरवरी 2026 को मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इस्लामपुर का नाम बदलकर श्रीरामपुर करने की सिफारिश की। इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर प्रक्रिया शुरू होने की खबर सामने आई और गांव में विरोध शुरू हो गया।
ग्रामीणों के अनुसार जून महीने में ग्राम पंचायत से नाम परिवर्तन संबंधी प्रस्ताव मांगे जाने की जानकारी मिली, जिसके बाद गांव के लोगों ने खुलकर विरोध दर्ज कराया। पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि ग्राम सभा में ऐसा कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया गया था।
सरपंच ने क्या कहा?
इस्लामपुर ग्राम पंचायत के सरपंच आमीन मनियार ने कहा कि पंचायत ने गांव का नाम बदलने का कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया है। उन्होंने प्रशासन को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि पंचायत स्तर पर नाम परिवर्तन को लेकर कोई आधिकारिक निर्णय नहीं लिया गया है।
सरपंच का कहना है कि गांव की बड़ी आबादी इस प्रस्ताव के खिलाफ है और इससे सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो सकता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बिना ग्रामीणों की सहमति के नाम बदलने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
मुख्यमंत्री कार्यालय से कलेक्टर को भेजा गया पत्र
मामले ने तब और तूल पकड़ा जब मुख्यमंत्री कार्यालय से झुंझुनूं जिला प्रशासन को इस्लामपुर का नाम बदलकर श्रीरामपुर करने संबंधी पत्र भेजे जाने की जानकारी सामने आई। इसके बाद जिला प्रशासन ने विभिन्न दस्तावेजों और ऐतिहासिक रिकॉर्ड की जांच शुरू की।
जिला कलेक्टर डॉ. अरुण गर्ग के अनुसार प्रशासन को नाम परिवर्तन के समर्थन और विरोध दोनों पक्षों से ज्ञापन प्राप्त हुए हैं। फिलहाल दस्तावेजी साक्ष्यों की जांच की जा रही है और नियमों के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।
क्या वास्तव में गांव का पुराना नाम श्रीरामपुर था?
भाजपा विधायक राजेंद्र भाम्बू का दावा है कि मुगल काल से पहले गांव का नाम श्रीरामपुर था और बाद में इसका नाम बदल गया। हालांकि अब तक इस दावे को प्रमाणित करने वाला कोई आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
विधायक का कहना है कि गांव के कुछ लोगों के पास पुराने रिकॉर्ड मौजूद हैं और उन्हें प्रशासन को सौंपा जाएगा। वहीं विरोध करने वाले ग्रामीणों का कहना है कि उनके पास 100 वर्ष से अधिक पुराने दस्तावेज हैं जिनमें गांव का नाम इस्लामपुर दर्ज है।
ग्रामीणों का विरोध क्यों?
इस्लामपुर में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय लंबे समय से साथ रहते आए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गांव की पहचान उसके नाम से जुड़ी हुई है और नाम बदलने से अनावश्यक विवाद पैदा हो सकता है।
स्थानीय निवासी मनीराम का कहना है कि गांव का नाम सदियों से इस्लामपुर है और यहां हमेशा भाईचारा कायम रहा है। उनके अनुसार नाम परिवर्तन से लोगों के बीच विभाजन पैदा हो सकता है।
बीएड की छात्रा सबा खानम का कहना है कि गांव का नाम बदलने के बजाय शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार नाम परिवर्तन की राजनीति से सामाजिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है।
पुराने दस्तावेजों का हवाला
विरोध कर रहे ग्रामीणों का दावा है कि उन्होंने जिला प्रशासन को कई पुराने दस्तावेज सौंपे हैं। इनमें स्कूल रिकॉर्ड, लगान रसीदें, राजस्व दस्तावेज और शिक्षा विभाग के पुराने रिकॉर्ड शामिल हैं, जिनमें गांव का नाम इस्लामपुर दर्ज है।
ग्रामीणों का कहना है कि ऐतिहासिक दस्तावेजों को नजरअंदाज करके नाम बदलना उचित नहीं होगा। उनका मानना है कि प्रशासन को सभी पक्षों की बात सुनकर ही फैसला लेना चाहिए।
सड़क पर उतरे ग्रामीण
नाम परिवर्तन के विरोध में ग्रामीणों ने पदयात्रा निकालकर जिला कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा है। बड़ी संख्या में लोगों ने प्रशासन से गांव का नाम न बदलने की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि उनकी मांगों को अनदेखा किया गया तो वे बड़े स्तर पर आंदोलन शुरू करेंगे। कुछ लोगों ने जयपुर तक मार्च निकालने और अनिश्चितकालीन धरना देने की चेतावनी भी दी है।
कुछ लोग नाम बदलने के पक्ष में भी
हालांकि गांव में हर व्यक्ति नाम परिवर्तन का विरोध नहीं कर रहा है। कुछ स्थानीय लोग मानते हैं कि गांव का मूल नाम श्रीरामपुर था और उसे फिर से बहाल किया जाना चाहिए।
समर्थकों का कहना है कि वे ऐतिहासिक प्रमाण जुटाकर प्रशासन को सौंपेंगे। उनका दावा है कि गांव के हजारों लोग नाम परिवर्तन के पक्ष में हैं और इसे सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखते हैं।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज
मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है। विरोध करने वाले ग्रामीणों और कुछ स्थानीय नेताओं का आरोप है कि नाम परिवर्तन का मुद्दा राजनीतिक लाभ के लिए उठाया जा रहा है। वहीं भाजपा नेताओं का कहना है कि यह केवल ऐतिहासिक तथ्यों और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा विषय है।
विधायक राजेंद्र भाम्बू ने कहा है कि जिले में आज भी भाईचारा कायम है और नाम परिवर्तन को लेकर किसी तरह का सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश नहीं की जा रही है।
क्या होगा अगला कदम?
फिलहाल जिला प्रशासन ऐतिहासिक और राजस्व रिकॉर्ड की जांच कर रहा है। प्रशासन का कहना है कि सभी तथ्यों की समीक्षा के बाद ही सरकार को रिपोर्ट भेजी जाएगी।
जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक इस्लामपुर का नाम बदलने को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया जाएगा। लेकिन इतना तय है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में राजस्थान की राजनीति और सामाजिक विमर्श में प्रमुख विषय बना रहेगा।
इस्लामपुर बनाम श्रीरामपुर का विवाद अब केवल नाम परिवर्तन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पहचान, इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सौहार्द से जुड़ी बहस का रूप ले चुका है। प्रशासनिक जांच और सरकार के अगले कदम पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं।

