Israel-Iran War: क्या ईरान से टकराव बेंजामिन नेतन्याहू की सबसे बड़ी राजनीतिक हार बन गया? ट्रंप की आलोचना के बाद बढ़ा दबाव

Praveen Yadav
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Israel Iran War News: तीन महीने से अधिक समय तक चले संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच एक अंतरिम समझौता सामने आया है। इस समझौते ने न केवल मध्य पूर्व की राजनीति को हिला दिया है, बल्कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की रणनीति और नेतृत्व पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इजरायल के प्रमुख समाचार पत्र Haaretz ने अपनी हेडलाइन में इसे “ईरान फियास्को” बताते हुए नेतन्याहू की सबसे बड़ी विफलता करार दिया है।
Israel Iran War News: तीन महीने से अधिक समय तक चले संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच एक अंतरिम समझौता सामने आया है। इस समझौते ने न केवल मध्य पूर्व की राजनीति को हिला दिया है, बल्कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की रणनीति और नेतृत्व पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इजरायल के प्रमुख समाचार पत्र Haaretz ने अपनी हेडलाइन में इसे “ईरान फियास्को” बताते हुए नेतन्याहू की सबसे बड़ी विफलता करार दिया है।

अमेरिका-ईरान समझौते ने बदला समीकरण

रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका ने ईरान के साथ एक अंतरिम समझौता तैयार किया है, जिसमें युद्धविराम, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय तनाव कम करने जैसे प्रावधान शामिल हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस प्रक्रिया में इजरायल की भूमिका बेहद सीमित दिखाई दी।


विश्लेषकों का मानना है कि वर्षों तक ईरान को सबसे बड़ा खतरा बताने वाले नेतन्याहू अब ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं जहां उनका प्रमुख सहयोगी अमेरिका भी उनकी रणनीति से पूरी तरह सहमत नहीं दिख रहा।

डोनाल्ड ट्रंप ने भी जताई नाराजगी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के दौरान इजरायल की कार्रवाई पर असंतोष जताया। ट्रंप ने कहा कि नेतन्याहू को लेबनान के मुद्दे पर "अधिक जिम्मेदार" रवैया अपनाना चाहिए।


ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब इजरायल लेबनान में सैन्य अभियान जारी रखे हुए है और ईरान ने इसे युद्धविराम समझौते का उल्लंघन बताया है।


इजरायल के भीतर भी बढ़ रहा विरोध

ईरान समझौते को लेकर इजरायल के अंदर भी राजनीतिक विरोध तेज हो गया है। विपक्षी नेता और पूर्व सैन्य अधिकारी गादी आइज़ेनकोट ने इसे "असफल सरकार का निराशाजनक परिणाम" बताया है।


उनका कहना है कि नेतन्याहू ने "पूर्ण विजय" का वादा किया था, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। वहीं, दक्षिणपंथी नेता इतामार बेन-गवीर और वित्त मंत्री बेज़ालेल स्मोट्रिच ने भी समझौते की आलोचना करते हुए इसे इजरायल के हितों के खिलाफ बताया।


क्या ईरान पहले से ज्यादा मजबूत हुआ?

युद्ध शुरू होने से पहले इजरायल का दावा था कि उसका उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना और क्षेत्रीय प्रभाव को खत्म करना है। लेकिन मौजूदा स्थिति में कई विशेषज्ञों का मानना है कि परिणाम इसके उलट निकला है।


लंदन के किंग्स कॉलेज के युद्ध अध्ययन विशेषज्ञ एहरोन ब्रेगमैन का कहना है कि ईरान की सरकार अभी भी सत्ता में है और पहले से अधिक कट्टर रुख अपना सकती है। इसके अलावा ईरान के पास होर्मुज जलडमरूमध्य पर प्रभाव बनाए रखने की क्षमता है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है।


होर्मुज जलडमरूमध्य बना रणनीतिक हथियार

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसका भौगोलिक स्थान है। यदि तेहरान भविष्य में फिर से होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान पैदा करता है, तो वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है।


इसी कारण अमेरिका और उसके सहयोगी देश किसी नए बड़े सैन्य संघर्ष से बचना चाहते हैं।


लेबनान बना नई चिंता

युद्धविराम के बावजूद लेबनान में तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ईरान ने आरोप लगाया है कि इजरायल ने समझौते के बाद भी कई बार युद्धविराम का उल्लंघन किया है।


विश्लेषकों का कहना है कि यदि लेबनान में संघर्ष दोबारा बढ़ता है तो यह अमेरिका-ईरान समझौते को खतरे में डाल सकता है और क्षेत्र में नए संकट की शुरुआत हो सकती है।


चुनाव से पहले नेतन्याहू पर बढ़ा दबाव

इस साल इजरायल में संभावित चुनाव होने हैं और ऐसे में नेतन्याहू की स्थिति पहले जितनी मजबूत नहीं दिखाई दे रही। आलोचकों का कहना है कि उनके खाते में पहले से ही 7 अक्टूबर 2023 की सुरक्षा विफलता दर्ज है और अब ईरान युद्ध के नतीजों ने उनकी राजनीतिक मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।


पूर्व इजरायली राजनयिक एलोन पिंकस का कहना है कि नेतन्याहू को अपने राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा अवसर मिला था, लेकिन वह इसका फायदा उठाने में असफल रहे।

निष्कर्ष

ईरान के खिलाफ लंबे समय तक आक्रामक नीति अपनाने वाले बेंजामिन नेतन्याहू अब घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर आलोचनाओं का सामना कर रहे हैं। अमेरिका-ईरान समझौते ने मध्य पूर्व की राजनीति को नया मोड़ दिया है और यह सवाल उठने लगा है कि क्या इस पूरे संघर्ष का सबसे बड़ा राजनीतिक नुकसान खुद नेतन्याहू को हुआ है।


आने वाले दिनों में समझौते पर अंतिम हस्ताक्षर और लेबनान की स्थिति तय करेगी कि यह युद्ध वास्तव में किसकी जीत और किसकी हार साबित होता है।

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