Competitive Authoritarianism: असम और बंगाल में बीजेपी की जीत भारत में 'प्रतिस्पर्धी तानाशाही' की आहट, जानें प्रोफेसर वार्ष्णेय का विस्तृत विश्लेषण

Praveen Yadav
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ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्णेय का बड़ा ओपिनियन; चुनाव तो नियमित होंगे, लेकिन सरकारी मशीनरी और नियमों के हेरफेर से चुनावी मैदान को एकतरफा करने का बढ़ा खतरा।

ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्णेय का बड़ा ओपिनियन; चुनाव तो नियमित होंगे, लेकिन सरकारी मशीनरी और नियमों के हेरफेर से चुनावी मैदान को एकतरफा करने का बढ़ा खतरा।

साल 2024 के ऐतिहासिक लोकसभा चुनावों को बीते हुए लगभग दो साल का वक्त हो चुका है। ऐसे में आज भारत की समकालीन राजनीति की स्थिति को किस नजरिए से समझा जाए? क्या देश के लोकतांत्रिक ढांचे को लेकर वास्तव में चिंता की कोई बड़ी वजह सामने आ रही है?

इन सभी सुलगते सवालों का जवाब देश के प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक और ब्राउन यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्णेय ने दिप्रिंट (ThePrint) में लिखे अपने ताजा ओपिनियन लेख में बेहद बारीकी से दिया है। उनके अनुसार, हाल ही में पश्चिम बंगाल और असम के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की जो बंपर जीत हुई है, वह केवल दो राज्यों के सामान्य चुनावी परिणाम नहीं हैं। यह जीत इस बात का साफ और स्पष्ट संकेत है कि भारत के भीतर अब "प्रतिस्पर्धी तानाशाही" (Competitive Authoritarianism) बेहद आक्रामक तरीके से दस्तक दे रही है।

2024 से 2026: कैसे बदला भारतीय राजनीति का नैरेटिव?

प्रोफेसर वार्ष्णेय ने लेख की शुरुआत में पिछले दो वर्षों के राजनीतिक घटनाक्रम और नैरेटिव में आए बड़े बदलावों को रेखांकित किया है:

📊 राम मंदिर और 400 पार का नैरेटिव: जनवरी 2024 में जब अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन हुआ, तब ऐसा लग रहा था कि हिंदू राष्ट्रवाद भारत की इकलौती और सबसे प्रमुख विचारधारा बन चुका है। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी ने '370 सीटें' और सहयोगियों के साथ '400 पार' का नारा दिया था।

📌 2024 के नतीजों का झटका: केवल चार महीने बाद राजनीतिक माहौल बदला और बीजेपी सिर्फ 240 सीटों पर सिमट गई। हालांकि सहयोगियों की मदद से सरकार तो बन गई, लेकिन राजनीतिक नैरेटिव पर पार्टी की पकड़ कमजोर हुई और विपक्ष को बढ़त मिल गई।

🔴 बंगाल-असम ने पलटी बाजी: इसके बाद हुए राज्यों के चुनावों, विशेषकर पश्चिम बंगाल और असम में बड़ी जीत दर्ज करके बीजेपी ने एक बार फिर से खुद को बेहद मजबूत और आक्रामक स्थिति में स्थापित कर लिया है। इन दोनों राज्यों ने देश की राजनीति की दिशा को पूरी तरह बदलकर रख दिया है।

बंगाल बनाम तमिलनाडु: अर्थव्यवस्था और राजनीति का विरोधाभास

लेख में दक्षिण और पूर्वी राज्यों के बीच आर्थिक और राजनीतिक महत्व के अंतर को एक दिलचस्प तुलना के जरिए समझाया गया है:

🗺️ सीटों का गणित: बीजेपी जिन दो राज्यों (बंगाल और असम) में जीती, वहां लोकसभा की कुल 56 सीटें हैं। इसके विपरीत, जिन दो राज्यों (तमिलनाडु और केरल) में वह नहीं जीत पाई, वहां कुल 59 सीटें हैं।

📈 तमिलनाडु का राजनीतिक उभार: तमिलनाडु (39 लोकसभा सीटें) में इन चुनावों के दौरान एक नई पार्टी और नए नेता का तेजी से उभार हुआ, जिसने दशकों पुरानी स्थापित पार्टियों को हरा दिया। लेकिन इसे केवल एक 'क्षेत्रीय महत्व' का परिणाम माना गया।

🏛️ बंगाल को क्यों मिला राष्ट्रीय महत्व?: आर्थिक रूप से तमिलनाडु आज एक बड़ी ताकत बन चुका है, जबकि आजादी के समय प्रति व्यक्ति आय में सबसे आगे रहने वाला बंगाल आज काफी पीछे है। 2020 तक तमिलनाडु की प्रति व्यक्ति जीडीपी राष्ट्रीय औसत की करीब 140% थी, जबकि बंगाल की 80% से भी कम थी। यही वजह है कि बड़ी संख्या में बंगाली नागरिक काम के लिए दक्षिण जाते हैं।

🤝 आधी सदी बाद दिल्ली-कोलकाता एक: आर्थिक रूप से पिछड़ा होने के बावजूद बंगाल को राष्ट्रीय महत्व इसलिए मिला, क्योंकि लगभग आधी सदी (50 साल) बाद ऐसा हुआ है जब दिल्ली में सरकार चलाने वाली पार्टी ही अब कोलकाता (सत्यजीत रे की भूमि) में भी सत्ता संभालेगी। इससे निजी निवेश बढ़ने और बंगाल की आर्थिक चमक लौटने की उम्मीद भी जगी है।

क्या होती है 'प्रतिस्पर्धी तानाशाही' (Competitive Authoritarianism)?

प्रोफेसर वार्ष्णेय का कहना है कि आर्थिक मोर्चे पर भले ही अच्छी खबरें हों, लेकिन राजनीतिक मोर्चे पर 'प्रतिस्पर्धी तानाशाही' का विचार भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है।

📖 अवधारणा की शुरुआत: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के स्टीवन लेविट्स्की और टोरंटो यूनिवर्सिटी के लुकन वे ने साल 2002 में 'जर्नल ऑफ डेमोक्रेसी' के एक लेख में (जो बाद में 2011 में कैंब्रिज से किताब के रूप में छपा) इस मिश्रित राजनीतिक व्यवस्था को दुनिया के सामने रखा था।

⚖️ लोकतंत्र और पूर्ण तानाशाही के बीच की स्थिति: यह एक ऐसी व्यवस्था है जो न तो पूरी तरह से लोकतंत्र होती है और न ही पूरी तरह से सैन्य या पूर्ण तानाशाही (Dictatorship)। यह दोनों के बिल्कुल बीच की स्थिति है।

🗳️ दिखावे का नियमित चुनाव: इस व्यवस्था के तहत देश में चुनाव तो पूरी तरह से नियमित और समय पर होते हैं, लेकिन सत्ता में बैठे लोग सरकारी संसाधनों, एजेंसियों और मशीनरी का इस तरह दुरुपयोग करते हैं कि विपक्षी उम्मीदवारों और उनके समर्थकों को परेशान किया जा सके।

📉 एकतरफा झुका हुआ मैदान: सत्ता पक्ष लोकतांत्रिक नियमों को पूरी तरह खत्म नहीं करता (ताकि दुनिया के सामने लोकतंत्र का मुखौटा बना रहे), लेकिन नियमों के साथ इस तरह छेड़छाड़ करता है कि चुनावी मैदान सत्ता पक्ष के लिए पूरी तरह एकतरफा झुक जाता है। इसके चलते सामान्य लोकतंत्र की तरह 'सत्ता का शांतिपूर्ण बदलाव' बेहद कठिन और संघर्षपूर्ण हो जाता है।

असम और बंगाल के दो फॉर्मूले: जेरिमैंडरिंग और SIR का खेल

लेखक के मुताबिक, असम और बंगाल में चुनावी मैदान को अपने पक्ष में झुकाने के लिए दो अलग-अलग कूटनीतिक हथकंडे अपनाए गए, जिनके नतीजे लगभग एक जैसे रहे:

📊 1. असम का 'जेरिमैंडरिंग' (Gerrymandering) फॉर्मूला: इसका सीधा मतलब होता है— चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन या फेरबदल। इसके तहत उन समुदायों या वोटरों को (जिनके सत्ताधारी पार्टी को वोट देने की संभावना नहीं है) कुछ सीमित सीटों के भीतर भारी संख्या में समेट दिया जाता है। इसके विपरीत, जो वोटर सत्ता पक्ष के समर्थक हैं, उन्हें चालाकी से ज्यादा सीटों पर फैला दिया जाता है। इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी असम में अपनी वास्तविक लोकप्रियता से कहीं ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब रही।

📌 2. बंगाल का 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (Special Intensive Revision - SIR): बंगाल में चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं तो नहीं बदली गईं, लेकिन मतदाता सूची (Voter List) को संशोधित करने के नाम पर कुछ खास समुदायों या वर्गों के वोट देने के अधिकार को ही कम कर दिया गया। बंगाल में एसआईआर (SIR) का सबसे बड़ा असर मुस्लिम मतदाताओं पर पड़ा (जिनमें से पिछले चुनावों में केवल 8% ने ही बीजेपी को वोट दिया था)।

🔴 रणनीति का अदृश्य प्रभाव: वोटर लिस्ट से हटाए गए कुल 27 लाख नामों में हालांकि सभी मुस्लिम नहीं थे, लेकिन एक खास समूह को सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया। विश्लेषकों का मानना है कि भले ही टीएमसी (TMC) की हार की यह इकलौती वजह न हो और वोटों का अंतर हटाए गए नामों से ज्यादा रहा हो, लेकिन चुनाव से पहले उठाए गए इन कदमों का एकमात्र उद्देश्य चुनावी खेल के मैदान को सत्ता पक्ष के पक्ष में मोड़ना ही था।

क्या भारत को पूर्ण प्रतिस्पर्धी तानाशाही बनने से रोका जा सकता है?

प्रोफेसर वार्ष्णेय का निष्कर्ष है कि भारत अभी पूरी तरह से राष्ट्रीय स्तर पर इस जाल में नहीं फंसा है। भारत को तुर्की के रेसेप तैयप एर्दोगन या हंगरी के विक्टर ऑर्बन जैसी पूर्ण 'प्रतिस्पर्धी तानाशाही' बनने से रोकने के लिए तीन मुख्य मोर्चे आज भी ढाल बनकर खड़े हैं:

📊 पहला- हमारी मजबूत संघीय व्यवस्था (Federalism): तमिलनाडु और केरल के हालिया उदाहरण यह साबित करते हैं कि असम और बंगाल जैसी एकतरफा चुनावी रणनीतियों को देश के हर हिस्से या हर राज्य में लागू कर पाना सत्ता पक्ष के लिए मुमकिन नहीं है। भारत की विविधता ही इसकी रक्षक है।

📌 दूसरा- न्यायपालिका की भूमिका: देश की अदालतें और मुख्य न्यायपालिका इस दौर में सिर्फ मूकदर्शक या दर्शक बनकर नहीं रह सकतीं। न्यायपालिका को मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने या मनमाने ढंग से क्षेत्रों की सीमाएं बदलने जैसे कदमों का पूरी सक्रियता और कड़ाई से विरोध करना होगा।

🔴 तीसरा- विपक्ष की एकजुटता और संघर्ष: हाल ही में हंगरी में तानाशाह प्रवृत्तियों के बावजूद वहां के विपक्ष ने एकजुट होकर बड़ी जीत हासिल की थी। यह दिखाता है कि अगर विपक्ष बड़े पैमाने पर जनसमर्थन जुटा ले, तो जनता का भारी आक्रोश वोट काटने या हटाने जैसी सभी रणनीतियों पर भारी पड़ सकता है।

अभी यह पूरी तरह साफ नहीं है कि भारत की राष्ट्रीय राजनीति का ऊँट किस करवट बैठेगा, लेकिन एक सच्चे लोकतंत्र के रूप में बस यही उम्मीद की जा सकती है कि भारत उस कगार पर न पहुँचे जहाँ उसे वैश्विक मंच पर एक 'कमजोर' या 'प्रतिस्पर्धी तानाशाही' वाले देश के रूप में जाना जाए।

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