🔴 JanDrishti Today: भारत में शिक्षा के अधिकार और डिजिटल इंडिया के बड़े-बड़े दावों के बीच नीति आयोग (NITI Aayog) की एक हालिया और बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट ने देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था के खोखले बुनियादी ढांचे की पोल खोलकर रख दी है।
नीति आयोग द्वारा मई 2026 में जारी की गई नीतिगत रिपोर्ट "स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया: टेम्पोरल एनालिसिस एंड पॉलिसी रोडमैप फॉर क्वालिटी एनहांसमेंट" (School Education System in India) के आधिकारिक आंकड़ों ने यह साफ कर दिया है कि आज भी देश के लाखों सरकारी स्कूल बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।
इस विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में करीब 14.71 लाख स्कूल हैं, जिनमें लगभग 24.69 करोड़ छात्र-छात्राएं शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। लेकिन इन स्कूलों में बिजली, साफ पानी, शौचालय और शिक्षकों जैसी अत्यंत आवश्यक चीजों की भारी किल्लत है। रिपोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बुनियादी ढांचे की यह गंभीर कमी सीधे तौर पर बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य को प्रभावित कर रही है।
देश भर में शौचालयों और बिजली का भारी संकट: नीति आयोग के आधिकारिक आंकड़े
नीति आयोग की इस रिपोर्ट में शिक्षा मंत्रालय के यूडीआईएसई+ (UDISE+ 2024-25) और हालिया राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट में इस बात को स्वीकार किया गया है कि पिछले एक दशक में स्कूलों में बुनियादी ढांचा सुधरा है, लेकिन वर्तमान समय (वर्ष 2026) में भी जो आंकड़े सामने आए हैं, वे बेहद डरावने और चिंताजनक हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, देश में महिला सशक्तिकरण और 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' जैसे राष्ट्रीय अभियानों के बावजूद, आज भी लाखों बेटियों को स्कूल में बुनियादी स्वच्छता नहीं मिल पा रही है। मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) के लिए जरूरी सुविधाओं की कमी के चलते किशोरियों की पढ़ाई बीच में ही छूट रही है।
📊 नीति आयोग की रिपोर्ट 2026 के अनुसार बुनियादी ढांचे की जमीनी हकीकत:
📌 बालिका शौचालय विहीन स्कूल: देश भर में कुल 98,592 सरकारी स्कूलों में बालिकाओं (Girls) के लिए क्रियाशील या उपयोग करने योग्य शौचालय ही मौजूद नहीं हैं।
📌 शौचालय विहीन कुल स्कूल: भारत के 61,540 स्कूलों में छात्र और छात्राओं दोनों के लिए ही कोई भी चालू हालत वाला शौचालय उपलब्ध नहीं है।
📌 बिजली संकट: देश के 1.19 लाख सरकारी स्कूल आज भी बिना बिजली (Electricity Connection) के चल रहे हैं, जिससे डिजिटल लर्निंग और स्मार्ट क्लास के दावे पूरी तरह फेल साबित हो रहे हैं।
📌 पीने के पानी की किल्लत: देश के 14,505 स्कूलों में बच्चों के लिए पीने के साफ पानी (Functional Water Source) की कोई व्यवस्था नहीं है।
📌 हाथ धोने की सुविधा का अभाव: करीब 59,829 स्कूलों में छात्रों के लिए हाथ धोने (Hand-washing Facilities) तक बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं है, जो बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा है।
राज्यवार स्थिति: हिंदी पट्टी और ग्रामीण भारत में सबसे बदतर हालात
नीति आयोग की रिपोर्ट में विभिन्न राज्यों के बीच बुनियादी ढांचे की भारी असमानता को भी रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, देश के कुल सिंगल-टीचर (एकल शिक्षक) स्कूलों में से लगभग 89 प्रतिशत स्कूल विशुद्ध रूप से ग्रामीण भारत (Rural Areas) में स्थित हैं।
बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों के ग्रामीण अंचलों में यह समस्या सबसे अधिक विकराल रूप धारण कर चुकी है। इन राज्यों में प्रति छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) भी माध्यमिक स्तर पर बेहद असंतुलित पाया गया है।
📊 विभिन्न राज्यों में बुनियादी ढांचे और संसाधनों की स्थिति:
🔴 उत्तर प्रदेश और बिहार: इन राज्यों के ग्रामीण इलाकों में छोटे और कम नामांकन (Under-enrolled) वाले स्कूलों की संख्या बहुत ज्यादा है, जहां एक तिहाई से अधिक स्कूलों में छात्रों की संख्या 50 से भी कम है।
🔴 मध्य प्रदेश और ओडिशा: इन राज्यों के आदिवासी और सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों में स्थित हजारों स्कूलों में आज तक बिजली का तार नहीं पहुंच पाया है, जिसके कारण गर्मियों में बच्चे बिना पंखे के पढ़ने को मजबूर हैं।
🔴 पूर्वोत्तर राज्य: असम, नगालैंड और मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में पीने के पानी और चालू शौचालयों का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से भी काफी नीचे दर्ज किया गया है।
'एकल शिक्षक' (Single-Teacher) के भरोसे चल रहे 1 लाख से अधिक स्कूल
इस रिपोर्ट का सबसे परेशान करने वाला पहलू देश के स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी और उनका असंतुलित वितरण है। शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) के नियमों को ताक पर रखकर आज भी देश के लाखों बच्चे केवल एक शिक्षक के भरोसे अपना भविष्य संवारने की कोशिश कर रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में 1,04,125 स्कूल ऐसे हैं जो पूरी तरह से 'सिंगल-टीचर' यानी एकल शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे हैं। यह कुल स्कूलों का लगभग 7 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा है।
📊 एकल शिक्षक स्कूलों का शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव:
📌 मल्टी-ग्रेड क्लासरूम: एक ही शिक्षक को पहली से लेकर पांचवीं कक्षा तक के सभी बच्चों को एक ही कमरे में एक साथ बैठाकर पढ़ाना पड़ता है, जिससे पढ़ाई की गुणवत्ता शून्य हो जाती है।
📌 प्रशासनिक बोझ का साया: इन शिक्षकों का अधिकांश समय गैर-शैक्षणिक कार्यों जैसे मिड-डे मील का हिसाब रखने, विभिन्न सरकारी सर्वे करने, चुनावी ड्यूटी और रिकॉर्ड-कीपिंग में चला जाता है।
📌 व्यक्तिगत ध्यान की कमी: एक ही शिक्षक होने के कारण बच्चों की कमजोरियों और उनकी रचनात्मकता पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देना पूरी तरह असंभव हो जाता है।
माध्यमिक स्तर पर विज्ञान प्रयोगशालाओं (Science Labs) और डिजिटल शिक्षा का अकाल
नीति आयोग ने अपनी इस समीक्षा में पाया कि जब बात प्राथमिक शिक्षा से ऊपर उठकर माध्यमिक (Secondary) और उच्च माध्यमिक (Higher Secondary) स्तर पर आती है, तो संसाधन और भी ज्यादा सीमित हो जाते हैं। भारत को वैश्विक स्तर पर एक तकनीकी सुपरपावर बनाने की बातें तो होती हैं, लेकिन देश के आधे माध्यमिक स्कूलों में विज्ञान की बुनियादी प्रयोगशालाएं तक नहीं हैं।
📊 वैज्ञानिक और डिजिटल ढांचे में असमानता का विवरण:
🔴 साइंस लैब की कमी: देश के सरकारी माध्यमिक स्कूलों में से केवल 51.7 प्रतिशत स्कूलों में ही क्रियाशील विज्ञान प्रयोगशालाएं (Science Laboratories) मौजूद हैं। शेष लगभग 50% स्कूलों के छात्र बिना कोई प्रैक्टिकल किए केवल किताबों से विज्ञान पढ़ रहे हैं।
🔴 इंटरनेट का अभाव: डिजिटल इंडिया मिशन के बावजूद, देश के लगभग एक-तिहाई सरकारी स्कूलों में आज भी इंटरनेट कनेक्टिविटी (Internet Connectivity) की कोई सुविधा नहीं है।
🔴 कंप्यूटर लैब्स गायब: ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकांश स्कूलों में कंप्यूटर और डिजिटल लर्निंग टूल्स या तो धूल फांक रहे हैं या बिजली न होने के कारण बंद पड़े हैं।
स्कूल छोड़ने की दर (Dropout Rates) और निजी स्कूलों की तरफ बढ़ता रुझान
नीति आयोग की इस रिपोर्ट ने एक और बड़े संकट की तरफ इशारा किया है, वह है बच्चों का सरकारी स्कूलों को छोड़ना। रिपोर्ट बताती है कि प्राथमिक स्तर पर तो बच्चों का नामांकन (Enrollment) बेहतर रहता है, लेकिन जैसे ही वे माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर पहुंचते हैं, स्कूल छोड़ने की दर (Dropout Rate) बहुत तेजी से बढ़ जाती है। उच्च माध्यमिक स्तर पर ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) घटकर महज 58.4 प्रतिशत पर आ जाता है, जिसका सीधा मतलब है कि लगभग आधे बच्चे बारहवीं तक पहुंचने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं।
इस खराब बुनियादी ढांचे, शौचालय की कमी और गिरती शैक्षणिक गुणवत्ता का नतीजा यह हो रहा है कि गरीब माता-पिता भी अब अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से निकालकर कम फीस वाले निजी स्कूलों (Low-fee Private Schools) में भेज रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2005 में देश के 71% बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, जो शैक्षणिक वर्ष 2024-25 में घटकर महज 49.24 प्रतिशत रह गए हैं। यानी अब देश के आधे से अधिक बच्चे निजी शिक्षा तंत्र पर निर्भर हो चुके हैं।
नीति आयोग का सुधारात्मक रोडमैप: 'सिलिंड्रिकल' स्कूलिंग मॉडल की सिफारिश
इस गंभीर संकट से उबरने के लिए नीति आयोग ने केंद्र और राज्य सरकारों के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण 8-सूत्रीय व्यवस्थागत और 5-सूत्रीय शैक्षणिक रोडमैप तैयार किया है। नीति आयोग ने साफ किया है कि जब तक शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को वर्तमान के 4.6% से बढ़ाकर जीडीपी के 6% तक नहीं किया जाता, तब तक इन कमियों को दूर करना नामुमकिन है।
📊 नीति आयोग द्वारा सुझाए गए प्रमुख सुधारात्मक कदम:
📌 कंपोजिट स्कूल मॉडल (Cylindrical Model): नीति आयोग ने टुकड़ों में बंटे प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के बजाय कक्षा 1 से 12वीं तक के 'कंपोजिट स्कूल' (Composite Schools) बनाने की वकालत की है, ताकि बच्चों को स्कूल बदलने की जरूरत न पड़े और ड्रॉपआउट रुके।
📌 स्कूल कॉम्प्लेक्स का गठन: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत 5 से 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाले छोटे स्कूलों को एक बड़े सीनियर सेकेंडरी स्कूल (मदर स्कूल) से जोड़कर संसाधनों जैसे लैब, लाइब्रेरी और शिक्षकों को साझा किया जाए।
📌 डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का एकीकरण: ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा पहुंचाने के लिए पीएम ई-विद्या (PM e-Vidya), भारतनेट (BharatNet) और पीएम गति शक्ति (PM Gati Shakti) योजनाओं को आपस में जोड़ने की सिफारिश की गई है।
निष्कर्ष: केवल दावों से नहीं, धरातल पर सुधार से बदलेगी देश की तस्वीर
नीति आयोग की वर्ष 2026 की यह लेटेस्ट रिपोर्ट भारत के शिक्षा तंत्र के लिए एक वेक-अप कॉल (चेतावनी) की तरह है। डिजिटल युग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक भारत की बातें तब तक बेमानी साबित होंगी, जब तक देश के 98 हजार स्कूलों की बेटियों को एक साफ शौचालय और 1.19 लाख स्कूलों को बिजली का एक बल्ब नसीब नहीं हो जाता।
सरकार को केवल कागजों पर नए नियम बनाने के बजाय धरातल पर जाकर प्रत्येक स्कूल की जवाबदेही तय करनी होगी। राज्य सरकारों को जिला टास्क फोर्स के माध्यम से युद्ध स्तर पर हर सरकारी स्कूल में पानी, बिजली, साइंस लैब और पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित करनी होगी, तभी जाकर सरकारी स्कूलों के प्रति आम जनता का खोया हुआ भरोसा वापस लौट पाएगा।

