अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर नया पेंच, ईरान बोला- इजरायल को लेबनान से हटना होगा

Praveen Yadav
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अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते को लेकर एक बार फिर अनिश्चितता बढ़ गई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने मंगलवार को कहा कि अगर युद्ध को पूरी तरह खत्म करना है तो इजरायल को दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना हटानी होगी। उनके इस बयान के बाद समझौते को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं।

अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते को लेकर एक बार फिर अनिश्चितता बढ़ गई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने मंगलवार को कहा कि अगर युद्ध को पूरी तरह खत्म करना है तो इजरायल को दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना हटानी होगी। उनके इस बयान के बाद समझौते को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं।


दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच जिस समझौते की चर्चा हो रही है, उसकी पूरी जानकारी अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है। ऐसे में ईरान की नई शर्त ने यह साफ कर दिया है कि दोनों पक्षों के बीच अभी कई मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है।


ईरान ने क्या कहा?

ईरान के सरकारी टीवी पर प्रसारित बयान में विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने कहा कि दक्षिणी लेबनान में इजरायली सेना की मौजूदगी युद्ध समाप्ति समझौते की भावना के खिलाफ होगी।


उन्होंने कहा कि लेबनान में युद्ध का अंत, पूरे क्षेत्र में शांति स्थापित करने का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब तक इजरायली सेना उन इलाकों से पीछे नहीं हटती जिन पर उसने संघर्ष के दौरान कब्जा किया है, तब तक युद्ध को पूरी तरह खत्म नहीं माना जा सकता।


अरागची ने यह भी चेतावनी दी कि अगर लेबनान में इजरायल की सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो ईरान इसे समझौते का उल्लंघन मानेगा।


अमेरिका ने नहीं दी स्पष्ट जानकारी

अब तक अमेरिका की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि प्रस्तावित शांति समझौते में लेबनान का मुद्दा शामिल है या नहीं। इसी वजह से ईरान के बयान के बाद स्थिति और अधिक जटिल होती दिखाई दे रही है।


विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों पक्ष समझौते की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं तो भविष्य में नए विवाद पैदा हो सकते हैं।


इजरायल ने बनाई दूरी

इजरायल ने भी इस समझौते को लेकर अपना अलग रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि यह समझौता अमेरिका और ईरान के बीच का मामला है और इजरायल इसकी शर्तों का पक्षकार नहीं है।


नेतन्याहू ने साफ कहा कि इजरायल की अपनी सुरक्षा प्राथमिकताएं हैं और उसकी सेना दक्षिणी लेबनान में बने बफर जोन में तब तक रहेगी, जब तक उसे आवश्यक समझा जाएगा।


पहले भी सामने आ चुकी है ऐसी स्थिति

यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका और ईरान के बीच किसी समझौते को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हुई हो। इससे पहले अप्रैल में हुए अस्थायी युद्धविराम के दौरान भी दोनों देशों ने अलग-अलग दावे किए थे।


उस समय भी व्यापक शांति स्थापित नहीं हो पाई थी और होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने का मुद्दा अधूरा रह गया था।


जिनेवा बैठक पर टिकी निगाहें

अब दुनिया की नजरें शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में होने वाली औपचारिक बैठक पर टिकी हैं। माना जा रहा है कि इस दौरान समझौते के कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को अंतिम रूप दिया जाएगा।


हालांकि ईरान और इजरायल के हालिया बयानों को देखते हुए यह साफ है कि अभी भी कई मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं।


यदि इन मतभेदों को समय रहते दूर नहीं किया गया तो क्षेत्र में तनाव फिर बढ़ सकता है और लंबे समय से जारी संघर्ष को खत्म करने की कोशिशों को झटका लग सकता है।


दुनिया क्यों कर रही है नजर?

मध्य पूर्व में स्थिरता का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। खासकर तेल व्यापार, समुद्री मार्गों और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर। इसलिए अमेरिका, ईरान, इजरायल और लेबनान से जुड़े हर घटनाक्रम पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है।


फिलहाल शांति समझौते को लेकर सस्पेंस बरकरार है और आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि क्या सभी पक्ष किसी साझा समाधान पर पहुंच पाते हैं या नहीं।

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