हानिकारक दवाओं पर प्रतिबंध से उठे बड़े सवाल: क्या भारत की दवा नीति में गहरी खामियां हैं?

Praveen Yadav
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केंद्र सरकार द्वारा 16 फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन (FDC) दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाने का फैसला एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार विशेषज्ञ समिति ने पाया कि इन दवाओं का कोई पर्याप्त चिकित्सीय औचित्य नहीं था और इनके उपयोग से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम पैदा हो सकते थे। यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद गठित विशेषज्ञ समिति की समीक्षा के आधार पर की गई।
16 एफडीसी दवाओं पर रोक, लेकिन सवाल अभी बाकी हैं

केंद्र सरकार द्वारा 16 फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन (FDC) दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाने का फैसला एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार विशेषज्ञ समिति ने पाया कि इन दवाओं का कोई पर्याप्त चिकित्सीय औचित्य नहीं था और इनके उपयोग से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम पैदा हो सकते थे। यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद गठित विशेषज्ञ समिति की समीक्षा के आधार पर की गई।

लेकिन इस फैसले ने भारतीय दवा नियामक व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। यदि ये दवाएं वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं थीं, तो इन्हें वर्षों तक बाजार में बिकने की अनुमति कैसे मिली? क्या नियामक तंत्र समय रहते संभावित जोखिमों की पहचान करने में विफल रहा?

आखिर क्या होती हैं FDC दवाएं?

फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन (FDC) ऐसी दवाएं होती हैं जिनमें दो या उससे अधिक सक्रिय औषधीय तत्वों को एक ही गोली, कैप्सूल या सिरप में मिलाया जाता है। कुछ मामलों में यह तरीका मरीजों के लिए लाभकारी हो सकता है, लेकिन जब बिना पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण के दवाओं को मिलाया जाता है, तब इसके दुष्परिणाम सामने आते हैं।

विशेषज्ञों ने जिन 16 दवाओं पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की, उनके बारे में निष्कर्ष निकाला गया कि उनका चिकित्सीय लाभ संभावित जोखिमों की तुलना में कम था।

दवा नीति की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?

भारत विश्व का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा उत्पादक देशों में से एक है। देश की दवाएं दुनिया के 200 से अधिक देशों तक पहुंचती हैं। इसके बावजूद दवा नियमन को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि किसी दवा को बाजार में आने से पहले उसकी प्रभावशीलता, सुरक्षा और गुणवत्ता की जांच कितनी कठोरता से होती है? यदि वर्षों बाद यह पता चलता है कि कोई दवा वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं थी, तो इसका अर्थ है कि स्वीकृति प्रक्रिया में कहीं न कहीं गंभीर कमियां मौजूद हैं।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद ही क्यों हुई कार्रवाई?

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि समीक्षा प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद तेज हुई। विशेषज्ञ समिति ने दवाओं की जांच की और फिर प्रतिबंध की सिफारिश की।

यह स्थिति बताती है कि कई बार नियामक संस्थाएं सक्रिय निगरानी के बजाय शिकायतों, मुकदमों या न्यायिक हस्तक्षेप के बाद कार्रवाई करती हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह प्रवृत्ति चिंताजनक मानी जाती है।

नकली और घटिया दवाओं की समस्या लगातार बनी हुई

भारतीय दवा उद्योग की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक नकली और निम्न गुणवत्ता वाली दवाओं की समस्या है।

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की नियमित जांच रिपोर्टों में समय-समय पर बड़ी संख्या में दवा नमूने "Not of Standard Quality" (NSQ) पाए जाते हैं। जनवरी 2026 में देशभर से जांचे गए 240 दवा नमूने गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे। इनमें कई सामान्य रूप से इस्तेमाल होने वाली दवाएं भी शामिल थीं।

यह स्थिति केवल एक महीने तक सीमित नहीं है। पिछले कई वर्षों से विभिन्न राज्यों से निम्न गुणवत्ता वाली दवाओं के मामले सामने आते रहे हैं।

राज्य स्तरीय निगरानी की चुनौतियां

दवा नियंत्रण व्यवस्था का बड़ा हिस्सा राज्यों के हाथ में होता है। कई राज्यों में निरीक्षकों की कमी, प्रयोगशालाओं की सीमित क्षमता और लंबी जांच प्रक्रियाएं नियमन को कमजोर बनाती हैं।

हाल के वर्षों में कुछ राज्यों में निर्मित दवाओं के अनेक नमूने गुणवत्ता जांच में विफल पाए गए। उदाहरण के तौर पर तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में निर्मित कई दवाओं को गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं पाया गया।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि पूरा राज्य या उद्योग खराब है, लेकिन यह संकेत जरूर मिलता है कि निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है।

कफ सिरप विवाद ने हिला दी थी दुनिया

भारत की दवा व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल तब उठा जब विषाक्त कफ सिरप से जुड़े मामलों में कई बच्चों की मौत की खबरें सामने आईं। इसके बाद दवा नियामकों ने कफ सिरप निर्माण इकाइयों की व्यापक जांच शुरू की और गुणवत्ता नियंत्रण को लेकर नए निर्देश जारी किए।

हाल ही में सरकार ने कफ सिरप की ओवर-द-काउंटर बिक्री पर भी सख्ती बढ़ाई और कई मामलों में चिकित्सकीय पर्चे को अनिवार्य बनाने की दिशा में कदम उठाए गए।

लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बिक्री नियंत्रण से समस्या का समाधान नहीं होगा। असली चुनौती उत्पादन स्तर पर गुणवत्ता सुनिश्चित करने की है।

क्या दवा उद्योग में भ्रष्टाचार भी एक कारण है?

स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञ लंबे समय से यह चिंता जताते रहे हैं कि कुछ मामलों में लाइसेंसिंग, निरीक्षण और गुणवत्ता निगरानी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी दिखाई देती है।

हालांकि पूरे चिकित्सा क्षेत्र को भ्रष्ट कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि लाखों डॉक्टर, फार्मासिस्ट, वैज्ञानिक और स्वास्थ्यकर्मी ईमानदारी से काम कर रहे हैं। लेकिन जब घटिया या नकली दवाएं बाजार तक पहुंच जाती हैं, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि नियामक तंत्र के किस स्तर पर चूक हुई।

सरकारी अस्पतालों में दवाओं की कमी

देश के कई हिस्सों में सरकारी अस्पतालों में आवश्यक दवाओं की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इसके प्रमुख कारण हैं:

- खरीद प्रक्रिया में देरी
- बजट आवंटन की सीमाएं
- आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियां
- भंडारण और वितरण संबंधी समस्याएं
- मांग का गलत आकलन

इन कारणों से मरीजों को कई बार बाहर से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।

समाधान क्या हो सकता है?

1. दवा अनुमोदन प्रक्रिया को और कठोर बनाया जाए

हर नई दवा और एफडीसी संयोजन की वैज्ञानिक समीक्षा अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होनी चाहिए।

2. CDSCO और राज्य नियामकों को मजबूत किया जाए

अधिक निरीक्षक, आधुनिक प्रयोगशालाएं और डिजिटल निगरानी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।

3. गुणवत्ता जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हों

दवा परीक्षण के परिणाम अधिक पारदर्शी तरीके से जनता के सामने रखे जाएं।

4. नकली दवा निर्माताओं पर कड़ी कार्रवाई

गंभीर मामलों में केवल जुर्माना नहीं बल्कि कठोर दंड और लाइसेंस रद्द करने की व्यवस्था होनी चाहिए।

5. सरकारी अस्पतालों की दवा आपूर्ति व्यवस्था सुधारी जाए

रियल-टाइम डिजिटल इन्वेंट्री और केंद्रीकृत खरीद प्रणाली से दवाओं की कमी को कम किया जा सकता है।

निष्कर्ष

16 एफडीसी दवाओं पर प्रतिबंध केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि यह भारतीय दवा नियामक व्यवस्था के सामने खड़े बड़े प्रश्नों की याद दिलाता है। जब तक दवा अनुमोदन, गुणवत्ता नियंत्रण, निरीक्षण और वितरण प्रणाली को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, तब तक समय-समय पर ऐसे विवाद सामने आते रहेंगे।

जनस्वास्थ्य की रक्षा केवल दवाओं पर प्रतिबंध लगाने से नहीं होगी, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करने से होगी जिसमें हानिकारक या अवैज्ञानिक दवाएं कभी बाजार तक पहुंच ही न सकें।

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