लखनऊ: उत्तर प्रदेश में मानसून का मौसम शुरू हो चुका है, लेकिन राज्य के अधिकांश हिस्सों में बारिश की भारी कमी ने सूखे का खतरा बढ़ा दिया है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार 1 जून से 21 जून 2026 तक प्रदेश में सामान्य से 41 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। इससे धान की रोपाई, भूजल स्तर, पेयजल आपूर्ति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
उत्तर प्रदेश में बारिश का असंतुलन बना चिंता का कारण
उत्तर प्रदेश इस समय दो अलग-अलग मौसमों का अनुभव कर रहा है। पश्चिमी यूपी के कुछ जिलों में सामान्य से कहीं अधिक बारिश दर्ज की गई है, जबकि पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश गंभीर वर्षा संकट का सामना कर रहे हैं।
संभल में 170 प्रतिशत, आगरा में 158 प्रतिशत, एटा में 155 प्रतिशत और हाथरस में 102 प्रतिशत अधिक वर्षा रिकॉर्ड की गई है। वहीं कौशांबी में एक जून से 21 जून तक एक बूंद भी बारिश नहीं हुई। कुशीनगर में 98 प्रतिशत, भदोही में 97 प्रतिशत, बांदा में 96 प्रतिशत और फतेहपुर में 94 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है।
IMD रिपोर्ट: प्रदेश में 41% बारिश की कमी
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में सामान्य 42.3 मिलीमीटर वर्षा के मुकाबले केवल 24.9 मिलीमीटर बारिश हुई है।
- प्रदेश में कुल वर्षा घाटा: 41%
- पूर्वी उत्तर प्रदेश में वर्षा घाटा: 58%
- पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वर्षा घाटा: 10%
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून की प्रगति फिलहाल धीमी पड़ गई है। बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाली नमी वाली हवाओं को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पा रहा है।
भीषण गर्मी और लू ने बढ़ाई मुश्किलें
बारिश की कमी के साथ-साथ भीषण गर्मी ने हालात और गंभीर बना दिए हैं। 21 जून को देश के पांच सबसे गर्म शहरों में चार उत्तर प्रदेश के थे।
- बांदा – 42.6°C
- प्रयागराज – 42.5°C
- वाराणसी – 42.4°C
- कानपुर – 42°C से अधिक
राजधानी लखनऊ में न्यूनतम तापमान 30.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य से लगभग चार डिग्री अधिक है। रातों में भी गर्मी बनी रहने से मिट्टी की नमी तेजी से खत्म हो रही है।
धान की रोपाई पर मंडराया संकट
उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े धान उत्पादक राज्यों में शामिल है। सामान्य परिस्थितियों में जून के दूसरे और तीसरे सप्ताह से धान की रोपाई शुरू हो जाती है, लेकिन इस बार कई जिलों में किसान बारिश का इंतजार कर रहे हैं।
बाराबंकी के किसान रामकिशोर वर्मा बताते हैं कि धान की नर्सरी तैयार है, लेकिन खेतों में पर्याप्त पानी नहीं है। डीजल पंप से सिंचाई करने पर लागत बढ़ रही है।
बहराइच, महोबा, फतेहपुर और बुंदेलखंड के अन्य क्षेत्रों में भी किसान इसी समस्या का सामना कर रहे हैं। कई किसान अब कम पानी वाली फसलों की ओर रुख करने पर विचार कर रहे हैं।
क्या उत्तर प्रदेश सूखे की ओर बढ़ रहा है?
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति केवल एक वर्ष की समस्या नहीं है। पिछले दो दशकों के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में मानसूनी वर्षा लगातार घट रही है।
आईएमडी की शोध पत्रिका "मौसम" में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार 2001 से 2020 के बीच प्रदेश में औसत मानसूनी वर्षा 697 मिलीमीटर रही, जबकि सामान्य औसत 790 मिलीमीटर है। यानी लगभग 12 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
पूर्वी उत्तर प्रदेश में अधिकांश वर्षों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। यही स्थिति पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में भी देखने को मिली है।
जलवायु परिवर्तन का दिख रहा असर
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार अब बारिश का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। पहले मानसून के दौरान कई दिनों तक लगातार हल्की और मध्यम बारिश होती थी। अब कम दिनों में अत्यधिक बारिश और लंबे सूखे अंतराल देखने को मिल रहे हैं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व मौसम वैज्ञानिक प्रो. बी.एन. मिश्र के अनुसार अल नीनो और वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का वितरण असंतुलित हो गया है। कुछ क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति बन रही है जबकि कई इलाके लंबे समय तक सूखे की चपेट में रह जाते हैं।
भूजल स्तर के लिए खतरे की घंटी
कम बारिश का सीधा असर भूजल स्तर पर पड़ रहा है। सिंचाई और पेयजल दोनों के लिए बड़ी आबादी भूजल पर निर्भर है। बारिश कम होने से ट्यूबवेल और बोरवेल का इस्तेमाल बढ़ जाता है, जिससे जलस्तर तेजी से नीचे जाता है।
जल विशेषज्ञों के अनुसार बुंदेलखंड, अवध और पूर्वांचल के कई जिलों में भूजल संकट पहले से ही गंभीर स्थिति में है। यदि मानसून कमजोर रहा तो आने वाले महीनों में पेयजल संकट और बढ़ सकता है।
आगरा अध्ययन ने बढ़ाई चिंता
सेंट जॉन्स कॉलेज आगरा और मिजोरम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि 1922 से 2022 के बीच आगरा की वार्षिक वर्षा में औसतन 1.63 मिलीमीटर प्रति वर्ष की कमी आई है।
शोध के अनुसार एक सदी में लगभग 160 मिलीमीटर वर्षा घट चुकी है। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो कृषि, भूजल पुनर्भरण और पेयजल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
अगले दो सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अगले दो सप्ताह में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो प्रदेश में कई गंभीर प्रभाव देखने को मिल सकते हैं:
- धान और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होगी
- सिंचाई लागत में वृद्धि होगी
- भूजल स्तर और नीचे जाएगा
- तालाब और जलाशयों का जलस्तर घटेगा
- ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट बढ़ेगा
- पशुपालन और चारा उत्पादन प्रभावित होगा
निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश में मानसून की धीमी रफ्तार और असंतुलित वर्षा वितरण ने चिंता बढ़ा दी है। जहां कुछ जिलों में रिकॉर्ड बारिश हो रही है, वहीं कई जिले सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहे हैं। बदलती जलवायु और कमजोर मानसून के संकेत भविष्य में कृषि, जल संसाधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। अब प्रदेश की निगाहें जून के अंतिम सप्ताह और जुलाई की शुरुआती बारिश पर टिकी हैं, जो आने वाले मौसम की दिशा तय करेगी।
रिपोर्ट: Praveen Yadav | JanDrishti Today

