कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। विधानसभा चुनाव में हार और सत्ता से बाहर होने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर सियासी संकट गहरा गया है। पार्टी के बागी विधायकों के गुट ने ममता बनर्जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाकर वरिष्ठ नेता और हावड़ा मध्य से विधायक अरूप रॉय को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया है। इस फैसले के बाद बंगाल की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और TMC के भीतर सत्ता संघर्ष खुलकर सामने आ गया है।
कौन हैं अरूप रॉय?
अरूप रॉय पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक जाना-पहचाना चेहरा हैं। उनका जन्म हावड़ा जिले में हुआ और उन्होंने छात्र राजनीति से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। शुरुआती दौर में वह कांग्रेस की छात्र राजनीति से जुड़े रहे, लेकिन बाद में ममता बनर्जी के नेतृत्व में बने तृणमूल कांग्रेस आंदोलन का हिस्सा बन गए।
जब वर्ष 1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) का गठन किया, तब अरूप रॉय उन नेताओं में शामिल थे जिन्होंने शुरुआती दौर से ही पार्टी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हावड़ा की राजनीति में मजबूत पकड़
अरूप रॉय को हावड़ा जिले में TMC का सबसे प्रभावशाली नेता माना जाता है। उन्होंने वर्षों तक पार्टी संगठन को मजबूत किया और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने का काम किया। इसी वजह से उन्हें पार्टी का "संकटमोचक" भी कहा जाता है।
हावड़ा मध्य विधानसभा सीट से अरूप रॉय लगातार चार बार विधायक चुने गए हैं। उन्होंने 2011, 2016, 2021 और 2026 के विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक पकड़ साबित की है।
ममता बनर्जी के भरोसेमंद नेताओं में थे शामिल
अरूप रॉय लंबे समय तक ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते रहे। वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल में 34 साल पुराने वाम शासन के अंत के बाद बनी पहली TMC सरकार में उन्हें कृषि विपणन मंत्री बनाया गया था। इसके बाद भी उन्होंने विभिन्न विभागों की जिम्मेदारी संभाली और हर सरकार में मंत्री पद पर रहे।
सहकारिता, कृषि विपणन और ग्रामीण विकास से जुड़े क्षेत्रों में उनकी सक्रिय भूमिका ने उन्हें प्रशासनिक अनुभव भी दिलाया।
कैसे बदली राजनीतिक स्थिति?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में TMC की हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ता गया। धीरे-धीरे कई विधायक और सांसद नेतृत्व परिवर्तन की मांग करने लगे। इसी क्रम में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने कोलकाता में बैठक कर नई वर्किंग कमेटी का गठन किया और अरूप रॉय को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया।
इस कदम को ममता बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ सबसे बड़ा राजनीतिक विद्रोह माना जा रहा है। हालांकि ममता समर्थक गुट ने इस फैसले को अभी तक स्वीकार नहीं किया है।
TMC की नई कार्यकारिणी में किसे मिली जिम्मेदारी?
बागी गुट की बैठक में पार्टी के नए संगठनात्मक ढांचे का भी ऐलान किया गया।
- राष्ट्रीय अध्यक्ष – अरूप रॉय
- उपाध्यक्ष – फिरहाद हकीम, रथिन घोष, सबीना यास्मीन
- महासचिव – ऋतब्रत बनर्जी, जावेद खान, संदीपन साहा
- कोषाध्यक्ष – अखरुज्जमान अंसारी
बागी नेताओं का दावा है कि नई कार्यकारिणी का गठन पार्टी संविधान के अनुरूप किया गया है और इसकी जानकारी चुनाव आयोग को भी दी जाएगी।
अरूप रॉय की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार अरूप रॉय की सबसे बड़ी ताकत उनका जमीनी जुड़ाव और संगठन पर मजबूत पकड़ है। हावड़ा जिले में उनकी लोकप्रियता और कार्यकर्ताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती है।
वह ऐसे नेता माने जाते हैं जो आम लोगों के बीच आसानी से उपलब्ध रहते हैं और स्थानीय समस्याओं को सीधे सुनते हैं। यही वजह है कि उन्हें "माटी का नेता" यानी जमीन से जुड़ा नेता कहा जाता है।
क्या TMC में बढ़ेगा संकट?
अरूप रॉय को अध्यक्ष बनाए जाने के बाद TMC के भीतर राजनीतिक संघर्ष और तेज होने की संभावना है। एक ओर ममता बनर्जी समर्थक गुट है, जबकि दूसरी ओर बागी विधायक और सांसद हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनाव आयोग किस गुट को वास्तविक तृणमूल कांग्रेस के रूप में मान्यता देता है।
फिलहाल इतना तय है कि अरूप रॉय के अध्यक्ष बनने के साथ ही पश्चिम बंगाल की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है और TMC के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।

